उत्तर भारत में हर साल धान की कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या गंभीर रूप ले लेती है. इससे जहां वातावरण में प्रदूषण बढ़ता है, वहीं किसानों के सामने पराली के निस्तारण की चुनौती भी खड़ी हो जाती है. लेकिन अब यही पराली खेती के लिए वरदान साबित होती नजर आ रही है. कृषि वैज्ञानिकों के नए प्रयोगों ने पराली को कम लागत वाली खेती का प्रभावी साधन बना दिया है. हिमाचल प्रदेश में कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में पराली के नीचे दबाकर बोई गई आलू की फसल 120 दिन बाद उम्मीद से बेहतर पैदा हुई है. लाल, बैंगनी कलर के आलू की किस्में उगाने में सफलता मिली है. बिना निराई गुड़ाई के केवल तीन बार पानी दिया गया और पराली ने खाद का काम किया.
पराली के इस्तेमाल से आलू की सफल खेती
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के चूरूडू गांव की महिला किसान सुरेश कुमारी ने इस तकनीक को अपनाकर एक नई मिसाल पेश की है. उन्होंने कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट के सुझाव पर धान की पराली का इस्तेमाल करते हुए बिना खेत की जुताई किए आलू की सफल खेती कर दिखाई है. इस प्रयोग में न केवल लागत बेहद कम आई, बल्कि आलू की बंपर पैदावार भी हुई.
महिला किसान सुरेश कुमारी ने कहा कि अक्टूबर में धान की फसल कटने के बाद खेत में बची पराली को लेकर असमंजस में थीं. उसी दौरान कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट के वैज्ञानिक डॉ. सौरभ शर्मा ने उन्हें पराली का उपयोग कर आलू की खेती करने का सुझाव दिया. शुरुआत में यह तरीका उन्हें थोड़ा अटपटा लगा, लेकिन उन्होंने प्रयोग के तौर पर अपने खेत के एक हिस्से में इसे अपनाने का फैसला किया.
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कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में बिना जुताई किए जमीन की सतह पर पंक्ति में आलू का बीज रखा गया और उसके ऊपर करीब आठ इंच मोटी धान की पराली बिछा दी गई. कुछ ही दिनों बाद पराली के बीच से आलू के पौधों की कोंपलें निकलने लगीं, जिसे देखकर किसान भी हैरान रह गईं. करीब 120 दिन बाद जब फसल तैयार हुई तो इसमें शून्य नुकसान के साथ आलू की भरपूर पैदावार मिली.
लाल और बैंगनी रंग के आलू उगाने में मिली सफलता
सबसे खास बात यह रही कि इस तकनीक से उगाए गए आलू को बाजार में पारंपरिक तरीके से उगाए गए आलू की तुलना में अधिक दाम भी मिल रहा है. इस प्रयोग में आलू की तीन किस्में उगाई गईं, जिनमें परंपरागत किस्म के साथ लाल और बैंगनी रंग के आलू भी शामिल हैं. इस तरीके से आलू की खेती लगभग शून्य लागत में संभव हुई है. खेत में हल चलाने की जरूरत नहीं पड़ी और धान की कटाई के बाद खेत में सीधे जमीन की सतह पर आलू का बीज रखकर उसे पराली से ढंक दिया गया. करीब चार महीने बाद इससे अच्छी पैदावार हुई.

महिला किसान सुरेश कुमार और उनके खेत में बिना पराली हटाए उगाई गईं बैंगनी रंग की आलू.
बिना निराई-गुड़ाई के आलू फसल तैयार
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सौरभ शर्मा ने कहा कि इस प्रयोग में नीलकंठ, पुखराज और कुफरी उदय किस्म के आलू उगाए गए. इन सभी किस्मों को जमीन की सतह पर रखकर ऊपर से धान की पराली की मोटी परत बिछा दी गई. करीब 120 दिन बाद बिना किसी निराई-गुड़ाई के आलू की फसल तैयार हो गई, जिसे आसानी से पराली के नीचे से निकाला जा सकता है.
तीन बार दिया गया पानी और पराली बन गई खाद
उन्होंने बताया कि पारंपरिक तरीके से आलू की खेती में करीब सात बार सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि इस तकनीक में केवल तीन बार पानी देने से ही फसल तैयार हो जाती है. फसल निकालने के बाद बची हुई पराली खेत में जैविक खाद के रूप में काम आती है, जिससे अगली फसल के लिए जमीन और अधिक उपजाऊ बनती है इस तरह यह तकनीक न केवल किसानों की लागत घटाने में मददगार साबित हो रही है, बल्कि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.