कश्मीर में मौसम बदलाव से गेहूं बुवाई और धान बुवाई चक्र अकसर टकराने से किसानों को एक फसल छोड़नी पड़ जाती रही है या फिर देरी से बुवाई करनी पड़ती थी. इससे उन्हें लागत ज्यादा और कम उत्पादन का सामना करना पड़ता रहा है. इस समस्या को दूर करने के लिए 10 साल से फसल चक्र के अनुरूप नई गेहूं किस्में विकसित करने में जुटे कृषि वैज्ञानिकों को सफलता मिली है. साल-दर-साल कई चरणों को पूरा करने के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की दो नई किस्में विकसित कर ली हैं, जो धान बुवाई से पहले पककर तैयार हो जाएंगी.
कश्मीर के कृषि वैज्ञानिकों ने फसल चक्र की समस्या को हल करने के लिए गेहूं की किस्में बनाईं हैं. शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी कश्मीर (SKUAST-K) के साइंटिस्ट्स ने गेहूं की दो नई किस्में बनाई हैं जो किसानों को समय पर फसल काटने में मदद मददगार होंगी. इसके साथ ही केंद्र शासित प्रदेश के कुल अनाज उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा.
कश्मीर में गेहूं देरी से पकने पर धान बुवाई का टूट जाता है रोटेशन
आमतौर पर देशभर में गेहूं अक्टूबर में बोया जाता है और गर्मियों की शुरुआत में काटा जाता है. हालांकि, कश्मीर में गेहूं देरी से पकता है और चावल की बुवाई के समय तक खेत खाली कर पाना मुश्किल हो जाता है. किसानों को धान की रोपाई के लिए मई-जून तक अपने खेत खाली करने होते हैं. अगर गेहूं जून तक खेत में रहता है, तो चावल-गेहूं का रोटेशन टूट जाता है.
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जल्दी पकने वाली गेहूं किस्में विकसित करने की शुरुआत
SKUAST-K में जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के कृषि अधिकारियों ने मीडिया को बताया कि गेहूं की पुरानी किस्मों के साथ एक बड़ी चुनौती यह थी कि ज्यादातर बीज हरियाणा और दिल्ली जैसे सब ट्रॉपिकल इलाकों से आते थे. कश्मीर के मौसम में ये किस्में देर से पकती थीं, अक्सर जून या जुलाई के आसपास. कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि हालांकि वे किस्में ज्यादा पैदावार वाली थीं, लेकिन उन्होंने फसल चक्र पर असर डाला. इसीलिए कश्मीर में प्लांट ब्रीडर ने जल्दी पकने वाली गेहूं की किस्में बनाने को प्राथमिकता दी, जिनकी कटाई मई के आखिर तक हो सके.
फसल चक्र अनुकूल गेहूं किस्म विकसित करने में लग गया एक दशक
कश्मीर में एक सफल चावल-गेहूं फसल प्रणाली शुरू करना एक दशक से भी ज्यादा पुराना रिसर्च टारगेट रहा है. यह आइडिया 2000 के दशक की शुरुआत में आया था जब इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की ओर से फंडेड गेहूं और जौ पर ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड प्रोजेक्ट के तहत पौधों की किस्मों का मूल्यांकन शुरू हुआ था. लगभग एक दशक की ब्रीडिंग और टेस्टिंग के बाद SKUAST-K के रिसर्चर ने गेहूं की दो नई किस्में बनाईं, जिन्हें शालीमार व्हीट-4 (SW-4) कहा जाता है, जो मई के आखिरी हफ्ते तक पक जाती हैं. दूसरी किस्म शालीमार व्हीट-3 (SW-3), जो जून के पहले हफ्ते में पक जाती है. दोनों को चावल-गेहूं रोटेशन में फिट होने के लिए डिजाइन किया गया है.