Sago process: हम सबने साबूदाना खाया है. व्रत में खिचड़ी, टिक्की या मीठा पकवान… साबूदाना हर घर में किसी न किसी रूप में इस्तेमाल होता है. लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि यह चावल या गेहूं की तरह कोई अनाज नहीं है. यह दरअसल एक जड़ वाली फसल से बनता है, जिसका नाम है टैपिओका या कसावा.
यह फसल सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में उगाई जाती थी, लेकिन अब भारत में भी बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती है. केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं. तमिलनाडु का सलेम इलाका तो साबूदाना उद्योग के लिए खास पहचान रखता है.
कसावा क्या है और क्यों है खास
कसावा एक ऐसी फसल है जो ज्यादा उपजाऊ जमीन या बहुत ज्यादा पानी की मांग नहीं करती. कम बारिश वाले इलाकों में भी यह अच्छी तरह उग जाती है. यही वजह है कि गरीब और छोटे किसान भी इसकी खेती आसानी से कर लेते हैं. इसके पौधे की जड़ में बहुत ज्यादा स्टार्च होता है. यही स्टार्च बाद में साबूदाना बनता है. इसलिए कसावा को कई जगहों पर सस्ती और भरोसेमंद फसल माना जाता है.
बीज से नहीं, तने से होती है खेती
कसावा की खेती थोड़ा अलग तरीके से की जाती है. इसमें बीज नहीं बोए जाते, बल्कि पौधे के तने की कटिंग लगाई जाती है. लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी तने की डंडियों को खेत में लगाया जाता है.
कुछ ही दिनों में इनसे नई पत्तियां निकल आती हैं और पौधा बढ़ने लगता है. करीब 8 से 12 महीने में इसकी जड़ पूरी तरह तैयार हो जाती है. दिसंबर का समय इसकी रोपाई के लिए अच्छा माना जाता है.
जड़ों से निकलता है स्टार्च
जब फसल तैयार हो जाती है, तब खेत से जड़ें निकाली जाती हैं. इन जड़ों को पहले साफ किया जाता है और उनका छिलका हटाया जाता है. फिर इन्हें पीसकर गूदा बनाया जाता है.
इस गूदे को पानी में कई दिनों तक भिगोकर रखा जाता है. ऐसा करने से उसमें मौजूद स्टार्च अलग हो जाता है. यही स्टार्च असली कच्चा माल है, जिससे आगे साबूदाना तैयार होता है.
छोटे-छोटे दाने कैसे बनते हैं
स्टार्च को मशीनों में डालकर छोटे गोल दानों का आकार दिया जाता है. ये दाने गीले होते हैं, इसलिए इन्हें धूप या मशीन की गर्म हवा से सुखाया जाता है.
सुखाने के बाद इन्हें हल्के स्टार्च या ग्लूकोज पाउडर से साफ और चमकदार बनाया जाता है. तभी ये सफेद और मोती जैसे दिखते हैं. इसके बाद पैकेट में भरकर बाजार में भेज दिया जाता है.
गांवों में रोजगार का जरिया
साबूदाना बनाने का काम सिर्फ फैक्ट्री तक सीमित नहीं है. इसमें किसान, मजदूर, छोटे उद्योग और पैकेजिंग से जुड़े लोग भी शामिल होते हैं. खासकर सलेम जैसे इलाकों में यह उद्योग हजारों लोगों को रोजगार देता है. कम लागत और ज्यादा मांग के कारण यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है.
रसोई तक पहुंचने की पूरी मेहनत
जब आप घर में साबूदाने की खिचड़ी बनाते हैं, तो शायद आपको यह अंदाजा नहीं होता कि यह छोटा सा दाना कितनी लंबी प्रक्रिया से गुजरकर आपकी थाली तक पहुंचा है. खेत में तने लगाने से लेकर जड़ निकालने, स्टार्च बनाने और फिर दाना तैयार करने तक हर कदम पर मेहनत लगती है.