Bamboo sector reforms: भारत में बांस अब सिर्फ जंगल में उगने वाला एक साधारण संसाधन नहीं रहा, बल्कि यह तेजी से बढ़ता हुआ एक मजबूत उद्योग बन चुका है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 133वें एपिसोड में उत्तर-पूर्व भारत में बांस सेक्टर के बढ़ते महत्व पर विस्तार से बात की और बताया कि कैसे यह क्षेत्र आज रोजगार, नवाचार और आत्मनिर्भरता का बड़ा केंद्र बन गया है.
उत्तर-पूर्व: बांस उद्योग की नई पहचान
प्रधानमंत्री ने उत्तर-पूर्व को भारत की “अष्टलक्ष्मी” कहा, यानी आठ राज्यों का ऐसा समूह जो देश के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है. उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है और बांस उनमें सबसे महत्वपूर्ण है. पहले बांस को केवल एक साधारण चीज माना जाता था, लेकिन अब यही बांस लाखों लोगों की आजीविका का आधार बन गया है. उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में बांस से जुड़े उद्योग तेजी से बढ़ रहे हैं और लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल रहा है.
कानून में बदलाव से आया बड़ा बदलाव
एक समय ऐसा था जब बांस को पेड़ की श्रेणी में रखा गया था. यह कानून अंग्रेजों के समय से चला आ रहा था. इसके कारण बांस को काटने, ले जाने और बेचने पर कई तरह की पाबंदियां थीं. इसका असर यह हुआ कि बांस से जुड़े पारंपरिक काम धीरे-धीरे खत्म होने लगे. लोग इस काम से दूर होने लगे और इसका पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे थे. लेकिन साल 2017 में सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर कर दिया. इस बदलाव के बाद बांस की खेती और व्यापार आसान हो गया. अब किसान और कारीगर बिना ज्यादा रोक-टोक के बांस का इस्तेमाल कर सकते हैं. यही वजह है कि आज यह सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है.
महिलाओं के लिए नई उम्मीद
बांस उद्योग का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. उत्तर-पूर्व के कई इलाकों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए बांस से जुड़े काम कर रही हैं. वे बांस से घरेलू सामान, सजावटी चीजें और अन्य उत्पाद बनाकर बाजार में बेच रही हैं. इससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला है. यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बड़ा असर डाल रहा है.
नवाचार और तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल
अब बांस का उपयोग केवल पारंपरिक तरीके से नहीं हो रहा, बल्कि इसमें नई तकनीक और नवाचार भी जुड़ गए हैं. त्रिपुरा के गोमती जिले के विजॉय सूत्रधार और दक्षिण त्रिपुरा के प्रदीप चक्रवर्ती जैसे लोगों ने इस क्षेत्र में नई सोच के साथ काम किया है. उन्होंने बांस उत्पादों को आधुनिक डिजाइन और तकनीक से जोड़ा, जिससे उनके उत्पादों की मांग बढ़ी है.
नागालैंड के दिमापुर में कई समूह बांस से खाद्य उत्पाद बना रहे हैं. वहीं मिजोरम के मामित जिले में टिशू कल्चर और पॉलीहाउस तकनीक के जरिए बांस की खेती को और बेहतर बनाया जा रहा है.
सिक्किम के गंगटोक के पास स्थित टीमों द्वारा बांस से फर्नीचर, अगरबत्ती स्टिक, हैंडीक्राफ्ट और इंटीरियर सजावट के सामान तैयार किए जा रहे हैं. इससे यह साफ है कि बांस उद्योग अब आधुनिक उद्यमिता का हिस्सा बन चुका है.
भारत में बांस की स्थिति और उत्पादन
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांस उत्पादक देश है. देश में बांस की 136 प्रजातियां पाई जाती हैं और इसकी खेती लगभग 13.96 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है.
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर-पूर्व के राज्य बांस उत्पादन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं. इनमें मध्य प्रदेश सबसे आगे माना जाता है.
कुछ खास प्रजातियां जैसे बम्बुसा टुल्डा, बम्बुसा बलूका, डेंड्रोकैलेमस एस्पर और मेलोकेन्ना जैसी प्रजातियां व्यावसायिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग
भारत से बांस और उससे बने उत्पादों का निर्यात भी तेजी से बढ़ रहा है. अमेरिका, यूके, फ्रांस, जर्मनी, यूएई, श्रीलंका और भूटान जैसे देश भारतीय बांस खरीदते हैं. बांस से बने फर्नीचर, टोकरियां, वॉल पैनल, कपड़े, कालीन और यहां तक कि खाने योग्य बांस के अंकुर भी विदेशों में भेजे जाते हैं.
भूटान ने तो एक साल में 1 करोड़ किलोग्राम से ज्यादा बांस भारत से खरीदा, जिसकी कीमत 12 लाख डॉलर से ज्यादा रही. यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बांस की मांग लगातार बढ़ रही है.
पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
बांस एक तेजी से बढ़ने वाला पौधा है और यह पर्यावरण के लिए बेहद लाभकारी है. यह कार्बन को अवशोषित करता है और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करता है.इसके साथ ही यह मिट्टी को मजबूत बनाता है और कटाव को रोकता है. इसलिए बांस की खेती केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.
लोगों से की गई खास अपील
प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे बांस से बने उत्पादों का उपयोग करें. उन्होंने कहा कि अगर लोग इन उत्पादों को खरीदेंगे और उपहार के रूप में देंगे, तो इससे स्थानीय कारीगरों को सीधा फायदा मिलेगा. यह कदम आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूत करेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएगा.