घाटा झेलकर भी खेती का रकबा बढ़ा रहे किसान, चावल उत्पादन में चीन को पछाड़ा

हकीकत यह है कि किसान देश के खाद्यान्न भंडार को भरने में एड़ी चोटी का जोर लगा देता है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में किसान को उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल पा रहा है. खेती की उपज का तीन चौथाई मुनाफा कारोबारियों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है.

निर्मल यादव
नोएडा | Updated On: 8 Jan, 2026 | 06:27 PM

चावल के उत्पादन में चीन को पीछे छोड़कर भारत, दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है. देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस उपलब्धि का श्रेय किसानों की मेहनत को दिया है. किसानों का हौसला कम न हो और वे लगातार उपज को बढ़ाते रहें, इसके लिए सरकार ने यूरिया के आयात को अब दोगुना कर दिया है. इसके प्रतिउत्तर में देश के किसानों ने भी खेतीबाड़ी से जुड़ी तमाम दुश्वारियों को नजरअंदाज कर इस साल रबी सीजन में बुआई के रकबे को बढ़ाकर दो गुना कर दिया है.
किसान अपनी मेहनत के बलबूते इन उपलब्धियों से देश का सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं, सरकार इसका श्रेय तो किसानों को दे रही है, मगर लाख टके का सवाल यह है कि क्या किसान को उसकी मेहनत के अनुपात में मुनाफा भी मिल रहा है?

किसान उत्पादन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हैं पर एमएसपी भी नहीं मिल पा रहा

हकीकत यह है कि किसान देश के खाद्यान्न भंडार को भरने में एड़ी चोटी का जोर लगा देता है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में किसान को उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल पा रहा है. खेती की उपज का तीन चौथाई मुनाफा कारोबारियों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. यही मूल वजह है कि भारत में किसान के हिस्से सिर्फ घाटा ही आता है. सरकार और समाज के स्तर पर व्यवहारिक रूप से यह स्वीकार कर लिया गया है कि मौजूदा व्यवस्था में खेती घाटे का ही सौदा है. इसके बावजूद देश के किसान खेती में घाटा झेलकर खाद्यान्न भंडार को न केवल भर रहे हैं, बल्कि दुनिया की बडी आबादी का भी पेट भरने में मदद कर रहे हैं. एक तरफ मुसीबतों से भरी खेती की दुश्वारियां प्रतिदिन लगभग 2 हजार किसानों को कृषि कार्य से मुंह मोड़ने के लिए विवश कर रही हैं, वहीं खेती से जन्म जन्मांतर का रिश्ता बना चुके ऐसे किसान भी हैं, जिनके बलबूते देश के अन्न भंडार भर रहे हैं.

चावल उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ा

सरकार द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत का चावल उत्पादन बढ़कर 15.18 करोड टन हो गया है. जबकि चीन में चावल के उत्पादन का स्तर अभी 14.5 करोड टन है. कृषि मंत्री ने इसे अभूतपूर्व उपलब्धि बताते हुए कहा कि देश में अनाज का प्रचुर भंडार है जो भारत की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करता है. कभी भोजन की कमी से जूझते रहे भारत को अन्न की आत्मनिर्भरता हासिल करने की यह उपलब्धि उन किसानों के निस्वार्थ परिश्रम से मिली है जो अपने हिस्से का मुनाफा कारोबारियों और भ्रष्ट तंत्र के सुपुर्द करके न्यूनतम लाभ अर्जित कर निरंतर अन्न भंडार को भर रहे हैं.  इस बीच सरकार ने किसानों को उत्पादन में कमी का सामना न करना पडे इसके लिए यूरिया के आयात को भी बढ़ा दिया है. सरकार को यह फैसला यूरिया के घरेलू स्तर पर उत्पादन में कमी आने के कारण करना पड़ा है.

बीते साल से दोगुना हो गया यूरिया का आयात

प्राप्त जानकारी के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2025-26 में यूरिया का आयात 120 प्रतिशत बढ़कर 71.7 करोड टन पहुंच गया है. भारतीय उर्वरक संघ के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में यूरिया का आयात का स्तर 32.6 करोड टन था. संघ ने बताया कि चालू वित्त वर्ष में यूरिया के घरेलू उत्पादन में 3.7 प्रतिशत की कमी आई है. इस अवधि में यूरिया का घरेलू स्तर पर उत्पादन 1.97 करोड टन हुआ है. जबकि इस साल यूरिया की बिक्री 2.5 करोड टन के स्तर पर पहुंच गई है. अकेले नवंबर 2025 में यूरिया की बिक्री 37 लाख टन हुई है. इससे स्पष्ट है कि सरकार खाद्यान्न उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए यूरिया के आयात को बढा रही है.

घाटे के बावजूद खेती के रकबे को बढ़ाने में कसर नहीं छोड़ रहे किसान

इस बीच किसानों ने भी खेती में हो रहे घाटे के बावजूद खेती के रकबे को बढ़ाने के प्रति अपने जज्बे को बरकरार रखा है. कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चालू रबी सीजन में किसानों ने बम्पर बुवाई करते हुए गत 2 जनवरी तक 634.14 लाख हेक्टेयर जमीन पर तमाम फसलों की बुवाई कर ली है. जबकि पिछले साल रबी सीजन में यह रकबा 617.74 लाख हेक्टेयर था. इस साल बोई गई फसलों के रकबे में हुई 16.40 लाख हेक्टेयर बढोतरी में गेहूं की बुवाई के रकबे में 6.3 प्रतिशत इजाफा शामिल है.

चालू वित्त वर्ष में धान की बुवाई का रकबा भी 14.5 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 17.5 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसकी प्रमुख वजह इस साल देर तक बारिश होना बताया गया है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चालू फसली सीजन में दलहनी फसलों की बुवाई का रकबा भी 130 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 134 लाख हेक्टेयर हो गया है. वहीं, चना और श्रीअन्न की बुवाई का रकबा भी बढा है.

मोटे अनाज में ज्वार और मक्का का रकबा बढा है, वहीं जौ की बुवाई में मामूली कमी दर्ज की गई है. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि तिलहन फसलों के प्रति भी किसानों का रुझान बढ रहा है. इस साल तिलहन का रकबा पिछले साल की तुलना में 93 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 96 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसमें सरसों की सर्वाधिक 89.36 लाख हेक्टेयर की है. हालांकि मूंगफली का रकबा घट कर 3.3 लाख हेक्टेयर हुआ है. वहीं सूरजमुखी और तिल की बुवाई में भी मामूली नरमी देखने को मिली है.

तमाम दुश्वारियों का मुकाबला करके भी किसानों का जज्बा बरकरार है

कुल मिलाकर खेती में तमाम दुश्वारियों का मुकाबला करके भी किसानों का जज्बा बरकरार है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर सरकार अपनी नीति और नियत को साफ करके खेती से होने वाले मुनाफे में किसानों को वाजिब हक दिलाने की पहल करे, तब फिर भारत काे दुनिया की कृषि आधारित सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था बनाने में किसान कोई कसर नहीं छोडेंगे.

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Published: 8 Jan, 2026 | 06:27 PM

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