झारखंड में 25 साल बाद लागू हुआ पेसा कानून, आदिवासी परंपराओं को बचाने पर मचा घमासान

झारखंड में जनजातीय इलाकों के रूप में अनुसूचित क्षेत्रों यानी शेड्यूल एरिया में पेसा कानून के तहत पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियमावली लागू कर दी गई है. इसके साथ ही ग्राम सभा के अधिकार और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक स्तर पर पेसा कानून काे लेकर बहस तेज हो गई है.

निर्मल यादव
नोएडा | Published: 22 Jan, 2026 | 07:17 PM
देश के आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में जनजातीय समुदायों की स्वशासन संबंधी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के मकसद से 25 साल के लंबे इंतजार के बाद ’पेसा कानून’ लागू कर दिया गया है. हालांकि इस कानून के वजूद में आने के साथ ही इसके कुछ प्रावधानों को लेकर सियासी और सामाजिक संगठनों के बीच तलवारें भी खिंच गई हैं. ऐसे में यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि पेसा कानून, झारखंड के आदिवासियों की जिंदगी को कितना बदल पाएगा?

झारखंड में 2 दशक के लंबे इंतजार के बाद अब सोरेन सरकार ने लागू किया एक्ट

भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची में देश के आदिवासी समुदायों की बहुलता वाले 10 राज्यों को शामिल किया गया है. इन राज्यों को अपनी प्राचीन शासन प्रणाली और अनूठी जीवन शैली से जुड़ी परंपराओं को संरक्षित करते हुए विकास की मुख्यधारा में शामिल होने के प्रावधान कर इन्हें कानून के रूप में लागू करने का अधिकार दिया गया है. इस मकसद को पूरा करने के लिए संसद से 1996 में पेसा कानून यानी प्रोविजन ऑफ द पंचायत एक्सटेंशन टू द शेड्यूल एरिया एक्ट 1996 लागू किया गया था. इसे 5वीं अनुसूची में शामिल राज्य अपनी सुविधा के अनुसार लागू कर सकते हैं. अब तक 5वीं अनुसूची के 8 राज्यों ने पेसा कानून के तहत अपने नियम बना कर लागू कर लिए हैं. अलग राज्य के रूप में 25 साल पहले गठित हुए झारखंड में भी 2 दशक के लंबे इंतजार के बाद अब हेमंत सोरेन सरकार ने आदिवासियों को स्वशासन का अधिकार देने वाला पेसा कानून लागू कर दिया है.

पेसा नियमों से आदिवासी परंपराएं कमजोर होने का आरोप

जानकारों का मानना है कि ग्राम सभा को अपनी स्थानीय कला एवं संस्कृति को संरक्षित करते हुए स्वशासन संबंधी परंपराओं को मजबूत बनाने के लिहाज से यह कानून महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि अब इसके नियमों पर बहस शुरू हो गई है. सत्ता पक्ष इसे राज्य की आदिवासी राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बता रही है, वहीं विपक्षी दल पेसा के नियमों से आदिवासी परंपराएं कमजोर होने का आरोप लगा रहे हैं. इस बीच कुछ आदिवासी संगठनों ने राज्य में पहले से प्रचलित आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में शासन प्रशासन का दखल बढने की आशंका जताते हुए इस कानून के भविष्य पर चिंता जाहिर भी की है.

लंबे इंतजार के बाद मिले स्वशासन के अधिकार से ग्राम सभाएं कितनी मजबूत हो पाएंगी

झारखंड में जनजातीय इलाकों के रूप में अनुसूचित क्षेत्रों यानी शेड्यूल एरिया में पेसा कानून के तहत पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियमावली लागू कर दी गई है. इसके साथ ही ग्राम सभा के अधिकार और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक स्तर पर पेसा कानून काे लेकर बहस तेज हो गई है. पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था से जुड़े आदिवासी संगठन इस बात पर विचार कर रहे हैं कि लंबे इंतजार के बाद मिले स्वशासन के अधिकार से ग्राम सभाएं कितनी मजबूत हो पाएंगी और इससे आदिवासियों की जिंदगी में कितना बदलाव आएगा. इस बहस के सार तत्व को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है. झारखंड में कुल 24 जिले हैं. इनमें से आदिवासी बहुल 13 जिले रांची, खूंटी लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, पूर्वी एवं पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला, दुमका जामताड़ा, साहिबगंज और पाकुड़ में पेसा कानून पूरी तरह से लागू होगा. जबकि पलामू, गोड्डा और गढ़वा जिलों में यह कानून आंशिक रूप से लागू किया गया है.
साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक झारखंड की कुल आबादी लगभग 3.29 करोड़ थी. राज्य के लगभग 79,714 वर्ग किलोमीटर कुल क्षेत्रफल में से लगभग 29.5 प्रतिशत वन आच्छादित क्षेत्र में आदिवासियों का निवास है. राज्य की कुल आबादी में आदिवासी एवं जनजातीय समुदायों की हिस्सेदारी 26.3 प्रतिशत है. इनमें से आधे से ज़्यादा आदिवासी राज्य के 12,164 गांवों में रहते हैं. झारखंड में 32 जनजातियां भी पाई जाती है. इनमें से 8 जनजातियों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के रूप में चिन्हित किया गया है.
झारखंड में पेसा कानून के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश का 40 फीसदी खनिज, इसी राज्य के वनक्षेत्रों में पाया जाता है. मौजूदा वक्त में झारखंड से सालाना लगभग 16 करोड़ टन खनिजों का उत्पादन हो रहा है. इसकी अनुमानित कीमत 15,000 करोड़ रुपये है. इससे झारखंड को महज 3,500 करोड़ रुपये का ही राजस्व मिल पाता है.

झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं. अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक स्वशासन प्रणाली के रूप में मानकी मुंडा व्यवस्था और माझी-परगना व्यवस्था लागू थी. इसके तहत मानकी मुंडा और माझी-परगना प्रणाली के 28,550 पदाधिकारियों को राज्य सरकार हर महीने सम्मान राशि भी देती है. अब पेसा कानून लागू होने के बाद आदिवासी बहुल इलाकों में भी ग्राम सभा को सबसे मजबूत और सर्वोच्च इकाई के रूप में स्थापित किया गया है. इन ग्राम सभा क्षेत्र में स्थानीय आदिवासी परंपराओं के तहत प्रचलित रीति-रिवाज के मुताबिक ही मान्यता प्राप्त व्यक्ति ग्राम सभा का अध्यक्ष होगा. इसके अलावा ग्राम सभा अपने पारंपरिक क्षेत्र के भीतर प्राकृतिक और सामुदायिक संसाधनों, लघु जल एवं खनिज स्रोतों का प्रबंधन कर सकेंगी.

कुरीतियों के खिलाफ सख्त कदम उठा सकेंगी ग्राम सभाएं

इसके अलावा आदिवासी ग्राम सभाओं को कुछ अहम अधिकार भी दिए गए हैं. इनके तहत ग्राम सभा अपने इलाके में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सख्त कदम उठा सकेंगी. इतना ही नहीं, वे अपने क्षेत्र में चल रहे किसी विवाद को सुलझा सकेंगी अधिकतम 2 हजार रुपये तक का आर्थिक दंड लगाने का भी उन्हें अधिकार प्राप्त होगा. इसके समानांतर पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं की सीमा को मान्यता देने और इसका प्रकाशन करने की जिम्मेदारी, जिले के उपायुक्त (डीसी) को दी गई है. डीसी के स्तर से गठित बहु-अनुशासनात्मक टीम (एमडीटी) ग्राम सभा से परामर्श कर स्थानीय विकास की वार्षिक योजना को तैयार करेगी.
राज्य सरकार ग्राम सभाओं के इन अधिकारों को वर्षों के संघर्ष के बाद आदिवासी स्वशासन की दिशा में एक बहुप्रतीक्षित सकारात्मक पहल बता रही है. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पेसा कानून को आदिवासी बहुल ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने वाला ऐतिहासिक कदम बताया है. सोरेन का दावा है कि इससे जल, जंगल और जमीन पर जनजातीय समुदाय का नियंत्रण मजबूत होगा. इससे इन समुदायों में स्वशासन की भावना भी मजबूत बनेगी.

वहीं, विपक्षी खेमे में शामिल राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, चंपई सोरेन, बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा ने हेमंत सोरेन सरकार पर पेसा कानून के मार्फत ग्राम सभाओं की वैधानिक सर्वोच्चता को कमजोर करने का आरोप लगाया है. इन नेताओं की दलील है कि राज्य सरकार ने मूल पेसा कानून 1996 की भावना के साथ छेड़छाड़ करके नए नियम बनाए है.  इसमें आदिवासियों के रूढ़िजन्य कानूनों, धार्मिक प्रथाओं और पंरपराओं की भी अनदेखी की गई है.

आदिवासी संगठनों की चिंता क्या है

इसी प्रकार तमाम आदिवासी संगठनों ने राज्य के राज्यपाल संतोष गंगवार से भी मुलाकात कर पेसा कानून के गुणदोषों का जिक्र किया है. इनकी दलील है कि पेसा कानून में ग्राम सभाओं के स्वशासी अधिकारों काे तो शामिल किया गया है, किंतु इसमें सरकारी दखल, आदिवासी शासन प्रणाली की मूल भावना को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा. इस दखल को सरकारी सिस्टम से तैनाम पंचायत सचिव की मौजूदगी के रूप में चिन्हित किया गया है. उनका दावा है कि एक अदना सा पंचायत सचिव जब ग्राम सभा में दखल देगा, तो पारंपरिक स्वशासन पद्धति का मार्ग कैसे प्रशस्त हाेगा. इससे आदिवासी स्वशासन प्रणाली के कमजोर होने और इनके अधिकारों में कटौती होने का खतरा भी बढ़ गया है. साथ ही आदिवासियों के एक वर्ग यह शंका भी सता रही है कि पेसा कानून कहीं भविष्य में झारखंड पंचायत राज एक्ट-2001 (जेपीआरए) का दूसरा संस्करण साबित न हो जाए.

इन सभी शंकाओं और सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में ही छुपा है, लेकिन इतना तय है कि परिणाम जो भी हो, पेसा कानून को लंबे इंतजार के बाद मिली एक ऐसी सौगात के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसकी मदद से आदिवासी अपने हक हुकूक को हासिल कर सकेंगे.

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