Pesticide Data Protection: भारत की प्रमुख फसल सुरक्षा कंपनियों ने केंद्र सरकार से कीटनाशक विधेयक के मसौदे में 5 साल के नियामक डेटा संरक्षण का प्रावधान शामिल करने की मांग की है. कंपनियों का कहना है कि, अगर नए कृषि रसायनों से जुड़े रिसर्च और सुरक्षा संबंधी डेटा को कुछ सालों तक सुरक्षित रखा जाता है, तो इससे कंपनियों को नए उत्पाद विकसित करने में भरोसा मिलेगा. इसका फायदा आगे चलकर किसानों को भी मिल सकता है. इस मांग को लेकर क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन, रैलिस इंडिया, धानुका एग्रीटेक, पीआई इंडस्ट्रीज और गोदरेज एग्रोवेट जैसी कंपनियां एक साथ आई हैं. इनमें से चार कंपनियां शेयर बाजार में दर्ज हैं.
नई दवा तैयार करने में करोड़ों का खर्च
कंपनियों का कहना है कि खेती के लिए किसी नए मॉलिक्यूल को भारत में लाने का काम आसान नहीं है. इसके लिए रिसर्च, परीक्षण और अलग-अलग सुरक्षा जांच पर करीब 40 से 50 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं. इसके अलावा नए रसायन की स्थानीय परिस्थितियों में सुरक्षा, असर और फसलों पर उसके प्रभाव की जांच में करीब 6 से 8 साल लग जाते हैं. यानी किसी नए उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में कंपनियों को काफी पैसा और लंबा समय लगाना पड़ता है.
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता इसी निवेश को लेकर है. उनका तर्क है कि अगर उनके जमा किए गए नियामक डेटा को सुरक्षा नहीं मिलती है, तो दूसरी कंपनी उसी जानकारी का इस्तेमाल कर कम खर्च में अपना उत्पाद बाजार में ला सकती है.
75 लाख रुपये में डेटा का इस्तेमाल होने का दावा
कंपनियों के मुताबिक, डेटा सुरक्षा नहीं होने की स्थिति में कोई दूसरी कंपनी करीब एक साल के भीतर सिर्फ 75 लाख रुपये खर्च करके पहले से उपलब्ध डेटा के आधार पर अपना उत्पाद पेश कर सकती है. ऐसे में पहली कंपनी, जिसने रिसर्च और परीक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, उसे अपने निवेश का सही फायदा नहीं मिल पाता. उद्योग का कहना है कि इससे नई तकनीक और नए कृषि रसायनों पर काम करने का उत्साह कम हो सकता है.
भारत में कम हैं कृषि रसायनों के विकल्प
कंपनियों ने भारत और दुनिया के बीच कृषि रसायनों के विकल्पों में अंतर का भी मुद्दा उठाया है. उनके मुताबिक, दुनियाभर में खेती के लिए करीब 1,200 मॉलिक्यूल इस्तेमाल किए जाते हैं, जबकि भारत में लगभग 380 मॉलिक्यूल ही पंजीकृत हैं. उद्योग का कहना है कि भारत में नए और आधुनिक रसायनों के लिए रास्ता खुलने से किसानों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे. ऐसे उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं, जिन्हें कम मात्रा में इस्तेमाल करने पर भी अच्छा असर मिले और जो फसलों व पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा सुरक्षित हों.
दूसरे देशों में पहले से मिलती है डेटा सुरक्षा
कंपनियों ने अपनी मांग के समर्थन में दूसरे देशों का उदाहरण भी दिया है. उनके अनुसार, भारत में फिलहाल नियामक डेटा सुरक्षा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. वहीं चीन में कृषि रसायनों से जुड़े डेटा को 6 साल तक सुरक्षा दी जाती है. थाईलैंड, ब्राजील और अमेरिका में यह अवधि 10 साल तक बताई गई है. यूरोपीय संघ में भी 10 साल की सुरक्षा का प्रावधान है, जबकि सुरक्षित और जैविक उत्पादों के मामले में इसे 13 साल तक बढ़ाया जा सकता है.