Rice Export: भारत और चीन के बीच चावल निर्यात को लेकर नया विवाद गहरा गया है. चीन ने भारतीय चावल की सात निर्यातक कंपनियों के लाइसेंस जीएमओ (Genetically Modified Organism) अंश मिलने का हवाला देते हुए निलंबित कर दिए हैं. दूसरी ओर भारतीय निर्यातकों का दावा है कि चीन भेजी गई सभी खेपों की भारत में नॉन-जीएमओ जांच हुई थी और प्रमाण पत्र भी जारी किए गए थे. अब राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़ ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से हस्तक्षेप कर दोनों देशों के बीच तकनीकी जांच कराने की मांग की है.
भारत में जीएम धान की व्यावसायिक खेती की अनुमति नहीं
छत्तीसगढ़ के राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने अपने पत्र में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) का हवाला देते हुए कहा है कि भारत में जीएम धान की व्यावसायिक खेती को मंजूरी नहीं दी गई है. ऐसे में चीन द्वारा भारतीय चावल में जीएम अंश मिलने का दावा गंभीर तकनीकी सवाल खड़ा करता है. एसोसिएशन के अनुसार, चीन रवाना होने से पहले सभी खेपों की मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में नॉन-जीएमओ जांच की गई थी और निर्यातकों के पास उसके वैध प्रमाण पत्र भी उपलब्ध हैं. यही वजह है कि दोनों देशों की जांच रिपोर्ट में आए अंतर को समझना जरूरी माना जा रहा है.
जांच रिपोर्ट में अंतर की संयुक्त तकनीकी पड़ताल की मांग
निर्यातकों ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) से आग्रह किया है कि इस मुद्दे को चीन सरकार के समक्ष आधिकारिक स्तर पर उठाया जाए. उनका कहना है कि विवाद का समाधान केवल कूटनीतिक बातचीत से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और तकनीकी जांच से संभव है. एसोसिएशन ने सुझाव दिया है कि भारत और चीन संयुक्त विशेषज्ञ समिति बनाकर सैंपल लेने की प्रक्रिया, लैब परीक्षण की पद्धति, परीक्षण मानकों और रिपोर्टिंग सिस्टम की समीक्षा करें. इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों देशों की जांच में अलग-अलग परिणाम क्यों आए.
सात कंपनियों से आगे बढ़ सकता है असर
निर्यातकों का मानना है कि यह मामला केवल सात कंपनियों तक सीमित नहीं है. यदि तकनीकी विवाद का समाधान नहीं हुआ तो भविष्य में अन्य भारतीय कंपनियों को भी चीन को चावल निर्यात करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. इससे भारत के चावल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बाजार में विश्वसनीयता पर भी असर पड़ने की आशंका है.
मार्च से शुरू हुआ था पूरा विवाद
यह विवाद मार्च 2026 में शुरू हुआ था, जब चीन ने जीएमओ (GMO) अंश मिलने का हवाला देकर तीन भारतीय कंपनियों की चावल खेप अस्वीकार कर दी और उनके लाइसेंस निलंबित कर दिए. बाद में इसी आधार पर चार अन्य भारतीय कंपनियों को भी प्रतिबंधित सूची में शामिल कर लिया गया. अब प्रभावित कंपनियों की संख्या सात हो चुकी है. भारतीय निर्यातक उम्मीद जता रहे हैं कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग और पारदर्शी जांच प्रक्रिया से इस विवाद का समाधान निकलेगा, जिससे भारत-चीन चावल व्यापार दोबारा सामान्य हो सके.