Cucumber cultivation: गर्मी का मौसम शुरू होते ही बाजारों में ठंडी और ताजगी देने वाली सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ जाती है. खीरा और ककड़ी ऐसी ही फसलें हैं, जिन्हें लोग सलाद, रायता और सीधे खाने के रूप में खूब पसंद करते हैं. यही वजह है कि गर्मियों में ककड़ी की खेती किसानों के लिए अच्छी कमाई का मौका बन सकती है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल कम लागत में अच्छा उत्पादन देती है. अगर सही तकनीक अपनाई जाए तो किसान एक ही सीजन में अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.
ककड़ी की खेती हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है. इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए अब कई किसान इसे नगदी फसल के रूप में अपना रहे हैं.
ककड़ी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और तापमान
ककड़ी गर्म और हल्की शुष्क जलवायु की फसल है. इसके पौधे 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में अच्छे से बढ़ते हैं. बहुत अधिक ठंड या पाला इस फसल के लिए नुकसानदायक होता है. आमतौर पर इसकी बुवाई फरवरी-मार्च में की जाती है, ताकि गर्मियों में अच्छी पैदावार मिल सके. जहां पर्याप्त धूप मिलती हो और पानी का ठहराव न हो, वहां ककड़ी का उत्पादन बेहतर होता है.
बरसात के मौसम में पौधों की बढ़वार तो ठीक होती है, लेकिन ज्यादा नमी से रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए गर्मी का मौसम इसकी खेती के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है.
मिट्टी और खेत की तैयारी
ककड़ी की अच्छी पैदावार के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है. ऐसी मिट्टी जिसमें पानी की निकासी अच्छी हो, वही इस फसल के लिए उपयुक्त है. मिट्टी का पीएच मान लगभग 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए.
खेती शुरू करने से पहले खेत को अच्छी तरह जोतना जरूरी है. पहले गहरी जुताई कर पुराने खरपतवार और घास को नष्ट कर दें. इसके बाद खेत में पानी लगाकर पलेवा करें. जब मिट्टी हल्की सूख जाए तो दोबारा जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लें. अंत में खेत को समतल कर मेड़ और नालियां बनाएं, ताकि सिंचाई और जल निकासी सही ढंग से हो सके.
बीज बुवाई के समय मिट्टी में हल्की नमी होनी चाहिए. बीजों को मेड़ों पर उचित दूरी पर बोया जाता है, जिससे पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके.
सिंचाई और देखभाल
ककड़ी की फसल को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन नियमित सिंचाई जरूरी है. सामान्यतः सप्ताह में दो बार सिंचाई पर्याप्त रहती है. गर्मी अधिक होने पर सिंचाई का अंतर कम किया जा सकता है. पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए, वरना जड़ों में सड़न हो सकती है.
फसल में समय-समय पर खरपतवार निकालना भी जरूरी है. पौधों की बढ़वार के दौरान जैविक खाद या सड़ी हुई गोबर की खाद डालने से उत्पादन बेहतर होता है. रोग और कीटों से बचाव के लिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है.
ककड़ी की उन्नत और संकर किस्में
आजकल किसान अधिक पैदावार के लिए उन्नत और संकर किस्मों का चयन कर रहे हैं. संकर किस्मों में प्रिया, हाइब्रिड-1, पंत संकर खीरा-1 और हाइब्रिड-2 प्रमुख हैं. ये किस्में जल्दी तैयार होती हैं और फल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
इसके अलावा पंजाब स्पेशल, जैनपुरी ककड़ी, दुर्गापुरी ककड़ी, अर्का शीतल और लखनऊ अर्ली जैसी किस्में भी किसानों के बीच लोकप्रिय हैं. हल्के हरे रंग की ककड़ी बाजार में अधिक पसंद की जाती है. फलों की तुड़ाई कच्ची अवस्था में करना बेहतर रहता है, इससे स्वाद और गुणवत्ता बनी रहती है.
अच्छी कमाई का अवसर
ककड़ी की खेती कम समय में तैयार होने वाली फसल है. बुवाई के लगभग 45 से 60 दिनों के भीतर फल मिलने लगते हैं. यदि किसान बाजार की मांग को ध्यान में रखकर सही समय पर फसल तैयार करें, तो उन्हें अच्छे दाम मिल सकते हैं. गर्मियों में इसकी मांग अधिक रहती है, जिससे मुनाफा बढ़ जाता है.