क्या गन्ना किसानों को 500 रुपये टन मिलेगी आर्थिक मदद? चीनी मिलों ने की सरकार से ये मांग

महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों ने अपनी मांग के समर्थन में पंजाब और कर्नाटक  सरकारों द्वारा दी गई सहायता का भी उदाहरण दिया है. एक अधिकारी ने कहा कि पंजाब सरकार ने गन्ने पर 685 रुपये प्रति टन की सहायता देने की घोषणा की है, जबकि कर्नाटक सरकार ने भी अपने राज्य की सहकारी चीनी मिलों को समर्थन दिया है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 10 Mar, 2026 | 01:48 PM

Maharashtra News: महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों ने राज्य सरकार से गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) का भुगतान करने के लिए 500 रुपये प्रति टन की आर्थिक सहायता देने की मांग की है. एक अधिकारी ने सोमवार को कहा कि राज्य में 100 से अधिक सहकारी चीनी मिलें हैं और उन पर बकाया राशि लगातार बढ़ रही है. अगर सरकार 500 रुपये प्रति टन की आर्थिक सहायता देने की मांग को मंजूर कर देती है, तो इससे गन्ना किसानों को काफी फायदा होगा. ऐसे में किसान अधिक मुनाफा के लिए और ज्यादा रकबे में गन्ने की बुवाई कर पाएंगे.

महाराष्ट्र सहकारी शुगर फैक्ट्री फेडरेशन के पदाधिकारियों ने हिन्दुस्तान टाइम्स से कहा है कि राज्य में एफआरपी का बकाया करीब 4,900 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जबकि मजदूरों, कटाई और परिवहन का भुगतान  जोड़ने पर कुल वित्तीय दबाव 8,000 से 9,000 करोड़ रुपये तक हो गया है. उन्होंने कहा कि गन्ने का एफआरपी 3,550 रुपये प्रति टन है, जबकि बैंकों से मिलों को केवल 2,440 रुपये प्रति टन ही मिल पाता है. इस कारण प्रति टन लगभग 1,160 रुपये का अंतर रह जाता है, जिसे पूरा करने के लिए मिलों ने सरकार से सहायता की मांग की है.

पंजाब और कर्नाटक सरकारों द्वारा दी गई सहायता का भी उदाहरण दिया

महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों ने अपनी मांग के समर्थन में पंजाब और कर्नाटक  सरकारों द्वारा दी गई सहायता का भी उदाहरण दिया है. एक अधिकारी ने कहा कि पंजाब सरकार ने गन्ने पर 685 रुपये प्रति टन की सहायता देने की घोषणा की है, जबकि कर्नाटक सरकार ने भी अपने राज्य की सहकारी चीनी मिलों को समर्थन दिया है. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों ने हमेशा गन्ना किसानों के भुगतान को प्राथमिकता दी है, लेकिन परिवहन और गन्ना कटाई से जुड़े मजदूरों का भुगतान अभी भी बाकी है.

परिवहन से जुड़ी दिक्कतें सामने आ सकती हैं

अधिकारी के अनुसार मौजूदा वैश्विक संघर्ष की स्थिति में निर्यात से ज्यादा फायदा नहीं होगा, क्योंकि परिवहन से जुड़ी दिक्कतें सामने आ सकती हैं. वहीं देश के अंदर चीनी के दाम अच्छे मिल रहे हैं, इसलिए मिलों की प्राथमिकता घरेलू बाजार में ही बिक्री करने की है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर फेडरेशन ने राज्य के सहकारिता विभाग के माध्यम से सरकार से मदद मांगी है और इस विषय पर कई बैठकों में भी चर्चा की गई है.

500 रुपये प्रति टन की सहायता देने की मांग की गई है

अधिकारी ने कहा कि सहकारी चीनी मिलों  ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं. इनमें गन्ने के एफआरपी और वास्तविक भुगतान के बीच के अंतर को पूरा करने तथा बकाया राशि चुकाने के लिए 500 रुपये प्रति टन की सहायता देने की मांग शामिल है. इसके अलावा गन्ना कटाई के काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए शुगर कमिश्नर और कृषि कमिश्नर को शामिल करते हुए एक समिति बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया है. उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग ने इन मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री से समय मांगा है, ताकि चीनी मिलों की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा कर उनका समाधान निकाला जा सके.

राज्य में गन्ने का रकबा करीब 14.87 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है

महाराष्ट्र में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. राज्य में गन्ने का रकबा करीब 14.87 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है और देश के कुल चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र का लगभग एक-तिहाई योगदान माना जाता है. वर्ष 2023-24 के सीजन में राज्य में करीब 1076.18 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की गई. महाराष्ट्र में लगभग 3 लाख गन्ना किसान हैं, जिनकी खेती मुख्य रूप से कोल्हापुर, सोलापुर, पुणे और अहमदनगर जिलों में केंद्रित है. ऐसे इस साल महाराष्ट्र में सबसे अधिक चीनी उत्पादन की संभावना जताई गई है. इसके बाद उत्तर प्रदेश में उत्पादन की उम्मीद की गई है.

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Published: 10 Mar, 2026 | 01:47 PM
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