zinc deficiency in soil: खेत में मेहनत करने वाला किसान जानता है कि अच्छी फसल सिर्फ बीज और पानी से नहीं होती. जैसे इंसान के शरीर को ताकत के लिए सही पोषण चाहिए, वैसे ही मिट्टी और पौधों को भी संतुलित पोषक तत्वों की जरूरत होती है. कई बार किसान पूरी मेहनत करता है, खाद-पानी में कोई कमी नहीं रखता, फिर भी फसल कमजोर रह जाती है या उम्मीद के मुताबिक पैदावार नहीं देती. ऐसी स्थिति में अक्सर एक छुपी हुई वजह होती है मिट्टी में जिंक की कमी. जिंक भले ही कम मात्रा में चाहिए, लेकिन इसका असर फसल पर बहुत गहरा होता है.
भारत की मिट्टी और जिंक की सच्चाई
भारत की खेती में जिंक की कमी एक बड़ी और गंभीर समस्या बन चुकी है. शोध बताते हैं कि देश की करीब आधी कृषि भूमि में जिंक की मात्रा जरूरत से कम है. हरित क्रांति के बाद लगातार ज्यादा उत्पादन लेने, एक जैसी फसलों की बार-बार खेती और असंतुलित उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी कमजोर होती गई. इसका नतीजा यह हुआ कि जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व धीरे-धीरे मिट्टी से खत्म होने लगे. किसान को इसका अंदाजा तब लगता है, जब फसल की बढ़वार रुक जाती है और मेहनत के बाद भी लाभ कम मिलता है.
पौधों के विकास में जिंक की भूमिका
जिंक पौधों के लिए उतना ही जरूरी है, जितना इंसान के लिए आयरन या कैल्शियम. यह पौधों की कोशिकाओं में बनने वाले एंजाइम को सक्रिय करता है, जो फसल की बढ़त, जड़ों के विकास और नई पत्तियों के बनने में मदद करते हैं. जिंक की मौजूदगी से पौधों में हरा रंग यानी क्लोरोफिल अच्छे से बनता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण बेहतर होता है. जब पौधा सही तरीके से भोजन बनाता है, तो वह ज्यादा मजबूत होता है, रोगों से लड़ पाता है और अंत में अच्छी पैदावार देता है.
जिंक की कमी से फसल पर क्या असर पड़ता है
जब खेत में जिंक की कमी होती है, तो उसका असर सबसे पहले पौधों की पत्तियों पर दिखता है. पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, खासकर नसों के आसपास हल्का पीलापन नजर आता है. नई पत्तियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं और आकार में छोटी रह जाती हैं. मक्का, धान और गेहूं जैसी फसलों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. धीरे-धीरे पौधे की बढ़वार रुक जाती है, बालियां या भुट्टे ठीक से नहीं भरते और दाने कमजोर रह जाते हैं. इसका सीधा नुकसान किसान की उपज और आमदनी पर पड़ता है.
जिंक से कैसे बढ़ेगी पैदावार और कमाई
अगर मिट्टी में जिंक की कमी समय रहते पूरी कर दी जाए, तो फसल में साफ फर्क नजर आने लगता है. पौधे तेजी से बढ़ते हैं, तना मजबूत होता है और दानों का भराव बेहतर होता है. जिंक मिलने से फसल में प्रोटीन और स्टार्च की मात्रा भी बढ़ती है, जिससे गुणवत्ता सुधरती है. अच्छी क्वालिटी की फसल बाजार में बेहतर दाम दिलाती है और किसान को मेहनत का पूरा फल मिलता है.
जिंक देने का सही समय और तरीका
जिंक की पूर्ति के लिए किसान आमतौर पर जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें अच्छी मात्रा में जिंक मौजूद होता है. सबसे जरूरी बात यह है कि जिंक का इस्तेमाल अनुमान से नहीं, बल्कि मिट्टी जांच के आधार पर किया जाए. बुआई से पहले या बुआई के समय जिंक को खाद के साथ मिलाकर देना सबसे अच्छा रहता है. इससे पौधों को शुरुआत से ही जरूरी पोषण मिल जाता है और पूरी फसल के दौरान उसका असर बना रहता है.
संतुलित पोषण से मजबूत खेती
आज की खेती में सिर्फ नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश पर निर्भर रहना काफी नहीं है. जिंक जैसे सूक्ष्म तत्व भी उतने ही जरूरी हैं. अगर किसान समय पर जिंक की कमी को पहचान कर सही मात्रा में इसका इस्तेमाल करें, तो न सिर्फ पैदावार बढ़ेगी बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी. मजबूत मिट्टी ही मजबूत खेती की नींव होती है, और जिंक उस नींव को मजबूत करने का अहम हिस्सा है.