डीजल से आजादी की ओर कदम, इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर बन रहे किसानों की नई ताकत

डीजल ट्रैक्टर लंबे समय से खेती की रीढ़ माने जाते रहे हैं. लेकिन डीजल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और इंजन की नियमित देखभाल का खर्च किसानों पर बोझ डालता है. इसके अलावा डीजल इंजन से निकलने वाला धुआं पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 23 Feb, 2026 | 07:30 AM

Electric Tractors: दुनिया भर में खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है. बढ़ती लागत, महंगा डीजल और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं ने किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. खासकर छोटे किसानों के लिए खेती का खर्च संभालना मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे समय में इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर एक नई उम्मीद बनकर उभरे हैं. ये ट्रैक्टर डीजल की जगह बैटरी से चलते हैं, जिससे न केवल ईंधन का खर्च घटता है बल्कि प्रदूषण भी कम होता है. हालांकि अभी इनका इस्तेमाल सीमित है, लेकिन तकनीक में तेजी से सुधार और बाजार के बढ़ते आकार से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले वर्षों में यह खेती की तस्वीर बदल सकते हैं.

छोटे किसानों के लिए क्यों जरूरी हैं इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर

डीजल ट्रैक्टर लंबे समय से खेती की रीढ़ माने जाते रहे हैं. लेकिन डीजल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और इंजन की नियमित देखभाल का खर्च किसानों पर बोझ डालता है. इसके अलावा डीजल इंजन से निकलने वाला धुआं पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है.

इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर इन समस्याओं का समाधान दे सकते हैं. इनमें धुआं नहीं निकलता, आवाज कम होती है और इनमें चलने वाले पुर्जों की संख्या भी कम होती है. इससे मरम्मत और रखरखाव का खर्च घटता है. छोटे किसानों के लिए, जो सीमित आय पर खेती करते हैं, यह लंबे समय में बड़ी बचत साबित हो सकती है.

अगर किसान के पास सोलर पैनल की सुविधा है तो वह अपने खेत में ही ट्रैक्टर चार्ज कर सकता है. इससे डीजल पर निर्भरता कम होती है और ऊर्जा की सुरक्षा भी बढ़ती है.

बाजार का बढ़ता आकार और संभावनाएं

वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. 2024 में इसका अनुमानित आकार करीब 0.7 अरब डॉलर था. विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक यह बाजार 3.4 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, यानी सालाना 28 प्रतिशत से ज्यादा की दर से वृद्धि हो रही है. 2033 तक इसके लगभग 4.8 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है.

भारत इस क्षेत्र में बड़ी संभावनाओं वाला देश है. यहां हर साल 10 लाख से अधिक ट्रैक्टरों की बिक्री होती है, जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार बन चुका है. इसके बावजूद इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है. देशभर में कुछ सौ इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर ही पंजीकृत हैं, जबकि लाखों डीजल ट्रैक्टर चल रहे हैं. 2025-26 वित्त वर्ष में इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर की बिक्री अभी दो अंकों तक ही सीमित रही, जिससे साफ है कि यह बाजार अभी शुरुआती दौर में है.

लागत और बुनियादी ढांचे की चुनौती

इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर की सबसे बड़ी चुनौती इसकी कीमत है. अभी ये डीजल ट्रैक्टर की तुलना में दो से ढाई गुना महंगे हैं. इसकी मुख्य वजह बैटरी की ऊंची लागत है. छोटे किसानों के लिए इतनी बड़ी शुरुआती रकम निवेश करना आसान नहीं है, भले ही लंबे समय में खर्च कम हो.

चार्जिंग की सुविधा भी एक बड़ी समस्या है. ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति कई बार नियमित नहीं रहती. लंबी अवधि तक काम करने वाले किसानों के लिए बैटरी की रेंज भी चिंता का विषय है. फिलहाल बाजार में उपलब्ध ज्यादातर इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर कम हॉर्सपावर के हैं, जो छोटे खेतों के लिए तो उपयुक्त हैं, लेकिन हर तरह के काम के लिए नहीं.

नीतियों और नए मॉडल की भूमिका

सरकारी नीतियां इस बदलाव को तेज कर सकती हैं. अगर इलेक्ट्रिक कृषि उपकरणों पर सब्सिडी दी जाए, टैक्स में राहत मिले और आसान ऋण उपलब्ध हो, तो किसानों के लिए यह विकल्प सुलभ हो सकता है. कुछ राज्यों ने प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है.

इसके अलावा ट्रैक्टर किराए पर देने या सहकारी मॉडल अपनाने से भी छोटे किसानों को फायदा मिल सकता है. “ट्रैक्टर ऐज़ ए सर्विस” जैसे मॉडल के जरिए किसान बिना पूरा पैसा खर्च किए इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं.

भविष्य की दिशा

इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर सिर्फ एक नई मशीन नहीं, बल्कि खेती को अधिक टिकाऊ और सस्ती बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं. जैसे-जैसे बैटरी की कीमतें कम होंगी और चार्जिंग सुविधाएं बेहतर होंगी, इनकी मांग बढ़ने की संभावना है.

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Published: 23 Feb, 2026 | 07:30 AM

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