डीजल की मार से परेशान किसान, जानिए कैसे इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर बना रहे हैं खेती को सस्ता और टिकाऊ

डीजल ट्रैक्टर अब तक इसलिए पसंद किए जाते रहे हैं क्योंकि वे ताकतवर और भरोसेमंद माने जाते हैं. लेकिन समय के साथ इनकी लागत किसानों की जेब पर भारी पड़ने लगी है. एक मध्यम क्षमता का डीजल ट्रैक्टर हर घंटे करीब तीन से चार लीटर ईंधन खपत करता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 19 Jan, 2026 | 09:12 AM

Electric tractors: भारत की खेती की पहचान लंबे समय से डीजल ट्रैक्टरों से जुड़ी रही है. खेत जोतने से लेकर बोवाई, ढुलाई और सिंचाई तक आज खेती के लगभग हर दूसरे काम में ट्रैक्टर की अहम भूमिका है. साल 2025 में देश में ट्रैक्टरों की घरेलू बिक्री लगभग 11 लाख यूनिट रही, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती दिखाती है. लेकिन इसी ताकत के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है डीजल पर निर्भरता. बढ़ती ईंधन कीमतें और पर्यावरण पर पड़ता दबाव किसानों के लिए लगातार मुश्किलें बढ़ा रहे हैं. ऐसे समय में इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर एक नए और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रहे हैं.

डीजल पर टिकी खेती और बढ़ता खर्च

डीजल ट्रैक्टर अब तक इसलिए पसंद किए जाते रहे हैं क्योंकि वे ताकतवर और भरोसेमंद माने जाते हैं. लेकिन समय के साथ इनकी लागत किसानों की जेब पर भारी पड़ने लगी है. एक मध्यम क्षमता का डीजल ट्रैक्टर हर घंटे करीब तीन से चार लीटर ईंधन खपत करता है. मौजूदा कीमतों के हिसाब से इसका मतलब है कि किसान को हर घंटे 400 से 500 रुपये तक का खर्च उठाना पड़ता है. अगर कोई ट्रैक्टर साल में करीब हजार घंटे चलता है, तो पांच साल में केवल ईंधन पर ही 10 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो जाते हैं.

इसके अलावा इंजन, फिल्टर, ऑयल और अन्य पुर्जों की मरम्मत का खर्च अलग से होता है. छोटे और सीमांत किसान, जो देश के कुल किसानों का 85 प्रतिशत से ज्यादा हैं, उनके लिए यह बोझ और भी ज्यादा भारी पड़ता है.

इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर: कम खर्च, ज्यादा बचत

इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर इस पूरी तस्वीर को बदलने की क्षमता रखते हैं. बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर से चलने वाले ये ट्रैक्टर डीजल पर पूरी तरह निर्भरता खत्म कर देते हैं. शुरुआती प्रयोगों और पायलट प्रोजेक्ट्स से पता चला है कि इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर को चलाने का खर्च सिर्फ 120 से 150 रुपये प्रति घंटा तक आता है. यानी डीजल ट्रैक्टर की तुलना में करीब एक-तिहाई खर्च.

अगर पांच साल की अवधि में इसका हिसाब लगाया जाए, तो एक किसान 12 से 15 लाख रुपये तक की बचत कर सकता है. जैसे-जैसे बैटरी तकनीक सस्ती और बेहतर होती जा रही है, आने वाले समय में इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर की कुल लागत और भी घटने की उम्मीद है.

पर्यावरण और सेहत पर सकारात्मक असर

खेती से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों में डीजल मशीनों का बड़ा योगदान है. एक सामान्य डीजल ट्रैक्टर सालभर में 12 से 15 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है. इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर इस मामले में पूरी तरह अलग हैं इनसे सीधे तौर पर कोई धुआं नहीं निकलता. इससे गांवों की हवा साफ होती है और किसानों को डीजल के धुएं से होने वाली सांस की बीमारियों से राहत मिलती है.

इसके अलावा इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर काफी शांत होते हैं. कम शोर और कम कंपन के कारण लंबे समय तक काम करने वाले किसानों पर इसका सकारात्मक असर पड़ता है.

अपनाने में चुनौतियां भी कम नहीं

फायदों के बावजूद इलेक्ट्रिक ट्रैक्टरों की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है. देश में कुल ट्रैक्टर बिक्री में इनका हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम है. मौजूदा मॉडल आमतौर पर 20 से 30 हॉर्सपावर के होते हैं, जो हल्के कामों के लिए तो ठीक हैं, लेकिन भारी जुताई जैसे कामों में अभी सीमित साबित होते हैं.

एक और बड़ी चुनौती शुरुआती कीमत है. जहां डीजल ट्रैक्टर 4 से 9 लाख रुपये में मिल जाते हैं, वहीं इलेक्ट्रिक ट्रैक्टरों की कीमत 6 से 16 लाख रुपये तक जाती है. गांवों में चार्जिंग की सुविधा और लगातार बिजली आपूर्ति की कमी भी किसानों को हिचकिचाने पर मजबूर करती है.

सरकारी नीतियां और नए मॉडल

इस बदलाव को तेज करने में सरकार की भूमिका बेहद अहम है. कुछ राज्यों ने इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर खरीद पर 2 से 5 लाख रुपये तक की सब्सिडी देने की घोषणा की है. साल 2024 में नए सुरक्षा और प्रदर्शन मानक लागू होने से कंपनियों को भी स्पष्ट दिशा मिली है.

इसके साथ ही लीज पर ट्रैक्टर देने, “पे-पर-यूज” मॉडल और कस्टम हायरिंग सेंटर जैसे नए प्रयोग छोटे किसानों के लिए रास्ता आसान बना सकते हैं. निजी कंपनियां इस दिशा में नई तकनीक और बिजनेस मॉडल के साथ आगे बढ़ रही हैं.

साफ और टिकाऊ

भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 180 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है. सौर ऊर्जा से चार्ज होने वाले इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर गांवों के लिए बड़ी संभावना बन सकते हैं. अगर नीतिगत समर्थन, वित्तीय सुविधा और बुनियादी ढांचे पर लगातार काम होता रहा, तो 2030 तक नए ट्रैक्टरों की बिक्री में इलेक्ट्रिक ट्रैक्टरों की हिस्सेदारी 10 से 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.

डीजल से इलेक्ट्रिक की यह यात्रा सिर्फ तकनीक बदलने की नहीं है. यह खेती को सस्ता, साफ और आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. किसानों की जेब, गांवों की हवा और देश की अर्थव्यवस्था तीनों के लिए यह बदलाव उम्मीद की नई किरण बन सकता है.

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