Telangana News: तेलंगाना के जंगांव जिले के पलाकुर्थी, देवरुप्पुला और कोडकंडला मंडलों में चल रहे यासंगी सीजन के दौरान भीषण पानी की कमी हो गई है. ऐसे में किसान अपनी फसल की सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं. कहा जा रहा है कि सिंचाई के अभाव में सैकड़ों एकड़ धान और मक्का की फसल सूख रही है. हालात इतने खराब हो गए हैं कि कई किसान अपनी फसलों को बचा नहीं पा रहे और मजबूर होकर अपने पशुओं को खेतों में ही चरने के लिए छोड़ रहे हैं.
किसानों का कहना है कि न तो बोरवेल में और न ही कृषि कुओं में पर्याप्त पानी बचा है, जिसके कारण खेतों में खड़ी फसल सूखती जा रही है. उन्होंने अधिकारियों से अपील की है कि नवापेट और स्टेशन घनपुर जलाशयों से इन मंडलों के ऊपरी क्षेत्रों में पानी छोड़ा जाए, ताकि खड़ी फसलों को बचाया जा सके. देवरुप्पुला मंडल के लाकावत थांडा गांव के किसान बी. रामदान ने द न्यू इंडिन एक्सप्रेस से कहा कि उनके इलाके में बोरवेल भी सूख चुके हैं और फसल बचाने के लिए एक बूंद पानी भी नहीं मिल रहा है. उन्होंने कहा कि मजबूरी में उन्हें अपनी दो एकड़ धान की फसल पशुओं के लिए चरने को छोड़नी पड़ी. सूखी फसल के कारण उन्हें लाखों रुपये का नुकसान हुआ है. उन्होंने राज्य सरकार से मुआवजा देने और बची हुई फसलों को बचाने के लिए कदम उठाने की मांग की है.
नहरों में सिंचाई के लिए छोड़ा जा रहा पानी
सर्किल सिंचाई अधीक्षण अभियंता बी. सीताराम ने कहा कि जिले में 8 जनवरी से नवापेट, अश्वारावपल्ली और स्टेशन घनपुर जलाशयों से नहरों के जरिए कृषि क्षेत्र के लिए पानी छोड़ा जा रहा है. हालांकि उन्होंने कहा कि ऊपरी कैचमेंट क्षेत्रों में बोरवेल और कृषि कुओं पर निर्भर रहने वाले किसानों को अभी भी पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि देवदुला परियोजना के पंप हाउस की मोटरें चल रही हैं और उनसे पानी उठाया जा रहा है.
खेत में सूख रही धान की फसल
इसी बीच पूर्व मंत्री एर्राबेली दयाकर राव ने सोमवार को देवरुप्पुला मंडल के धरमापुर गांव के माल्या थांडा में सूखी धान की फसल का निरीक्षण किया. इस दौरान उन्होंने सिंचाई मंत्री एन. उत्तम कुमार रेड्डी से फोन पर बात कर स्टेशन घनपुर जलाशय से 4L नहर में तुरंत पानी छोड़ने की मांग की, ताकि किसानों की खड़ी फसल को बचाया जा सके.
बता दें कि पिछले साल ही सीएसआईआर- नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI) के वैज्ञानिकों ने तेलंगाना में भूजल के दोहन को लेकर ठोस नीतियां बनाने और पानी के भंडारण को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत बताई थी. उनका कहना था कि यह कदम जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन लाखों लोगों की आजीविका बचाने के लिए जरूरी है, जो कृषि पर निर्भर हैं और जिनकी खेती काफी हद तक भूजल पर आधारित है.
15 अरब घन मीटर भूजल का इस्तेमाल होता है
तब एक अध्ययन का हवाला देते हुए वैज्ञानिकों ने कहा था कि इलाके की भू-वैज्ञानिक संरचना, खेती में पानी का अधिक उपयोग और अनियमित बारिश मिलकर भूजल के पुनर्भरण (रीचार्ज) को जटिल और असमान बना देते हैं. ऐसे तेलंगाना में हर साल धान की दो फसलें उगाई जाती हैं, जिनके लिए करीब 15 अरब घन मीटर भूजल का इस्तेमाल होता है. खासकर रबी (गर्मी) की फसल पूरी तरह एक्विफर यानी भूमिगत जल स्रोतों पर निर्भर रहती है. राज्य में हर साल लगभग 70 से 150 सेंटीमीटर बारिश होती है, लेकिन इसका केवल करीब 15 प्रतिशत ही भूजल को रिचार्ज कर पाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी की कमजोर संरचना, सीमित जल भंडारण क्षमता और चट्टानों में दरारों के कारण यह प्रक्रिया अक्सर करीब दो महीने की देरी से होती है.