Marathwada Kesar Mango: मई के दूसरे हफ्ते से मार्केट में दशहरी और लंगड़ा आम की आवक शुरू हो जाएगी. दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत की अधिकांश मंडियां दशहरी और लंगड़ा आम से गुजलार हो जाएंगी. इसकी खुशबू से ग्राहक खरीदारी करने के लिए अपने आप खींचे चले आएंगे. लेकिन दशहरी और लंगड़ा के शौकीन लोगों को महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में उगाए जाने वाले केसर आम के बारे में भी जान लेना चाहिए. ये भी स्वाद और खुशबू के मामले में लंगड़ा और दशहरी से किसी भी मायने में कम नहीं है. इन दोनों की तरह मराठवाड़ा के केसर आम को भी जीआई टैग मिला हुआ है.
मराठवाड़ा क्षेत्र के छत्रपति संभाजीनगर, जालना, बीड और लातूर जिले में उगाया जाने वाला यह केसर आम अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाना जाता है. इसका रंग केसरिया होता है, खुशबू बहुत खास होती है और इसमें 80 फीसदी से ज्यादा गूदा (पल्प) पाया जाता है. यह आम 15 मई के बाद बाजार में आता है और अल्फोंसो के बाद सबसे मीठे और लोकप्रिय देसी आमों में गिना जाता है.
30 नवंबर 2016 को GI टैग दिया गया
मराठवाड़ा के केसर आम को भारत सरकार की भौगोलिक संकेत (GI) रजिस्ट्री द्वारा 30 नवंबर 2016 को GI टैग दिया गया था, जो 29 सितंबर 2034 तक वैध रहेगा. इस आम के GI पंजीकरण का प्रस्ताव छत्रपति संभाजीनगर स्थित आम उत्पादक संघ ने दिया था. 2016 में आवेदन करने के बाद चेन्नई की GI रजिस्ट्री ने उसी साल इस आम को आधिकारिक पहचान दे दी. इसके बाद ‘मराठवाड़ा केसर आम’ नाम इस क्षेत्र में उगने वाले आमों की खास पहचान बन गया. यह भी खास बात है कि महाराष्ट्र में यह अल्फोंसो आम से पहले GI टैग पाने वाली पहली आम की किस्म है.
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किसान इतने हेक्टेयर में कर रहे आम की खेती
मराठवाड़ा के केसर आम की खेती मुख्य रूप छत्रपति संभाजीनगर में की जाती है, जहां 40,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में इसकी खेती होती है. इसके अलावा नांदेड़, उस्मानाबाद और लातूर जैसे जिलों में भी बड़े पैमाने पर केसर आम उगाया जाता है. यहां किसान अब अल्ट्रा-हाई-डेंसिटी प्लांटिंग (UHDP) तकनीक अपना रहे हैं, जिससे एक एकड़ में ज्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं, जबकि पहले पारंपरिक तरीके में कम पेड़ होते थे. यह आम महाराष्ट्र के गर्म और शुष्क मौसम में अच्छी तरह बढ़ता है. इसकी फसल आमतौर पर अप्रैल में शुरू होती है और जून तक अपने चरम पर पहुंच जाती है.
पारंपरिक खेती में सिर्फ 80 से 100 पेड़ होते हैं
ऐसे किसान एक एकड़ में 600 से ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं, जबकि पारंपरिक खेती में सिर्फ 80 से 100 पेड़ होते हैं. इससे फसल जल्दी और एक साथ तैयार होती है और उत्पादन भी ज्यादा मिलता है. UHDP तकनीक में नवंबर-दिसंबर के दौरान फूल जल्दी और एक साथ आते हैं और फल गिरने की समस्या भी कम होती है. खेती की लागत करीब 2.5 से 3 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर आती है, लेकिन उत्पादन ज्यादा होने के कारण किसानों को अच्छा मुनाफा मिलता है.
इतनी मीटर की दूरी पर करें पौधों की रोपाई
सफल खेती के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक से बाग तैयार किया जाता है. पौधों को सही दूरी (जैसे 3×3 मीटर) पर लगाना जरूरी होता है. जून 15 के बाद नियमित रूप से पेड़ों की छंटाई (प्रूनिंग) करनी चाहिए, जिससे उनका आकार ठीक रहता है और फूल-फल अच्छे आते हैं. इसके अलावा ड्रिप इरिगेशन अपनाने से पानी की बचत होती है और खाद का सही उपयोग होता है, जिससे उत्पादन भी बढ़ जाता है. मराठवाड़ा का केसर आम अब बाजार में काफी मांग में है और इसका एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश, कुवैत और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में निर्यात किया जाता है.
खबर से जुड़े जरूरी आंकड़े
- 40,000 हेक्टेयर है मराठवाड़ा के केसर आम का रकबा
- एक एकड़ में 600 पौधे लगाते हैं किसान
- बांग्लादेश, कुवैत और यूनाइटेड किंगडम में होता है निर्यात
- साल 2016 में मिला मराठवाड़ा के केसर को जीआई टैग
- 29 सितंबर 2034 तक वैध रहेगा जीआई टैग