Raw jute price: देश के जूट उद्योग पर इन दिनों गहराता संकट अब सरकार के दरवाजे तक पहुंच गया है. कच्चे जूट की भारी कमी और आसमान छूती कीमतों ने जूट मिलों की कमर तोड़ दी है. इसी को देखते हुए इंडियन जूट मिल एसोसिएशन (IJMA)ने केंद्र सरकार से बड़ा कदम उठाने की अपील की है. संगठन ने मांग की है कि 1 अप्रैल से निजी व्यापारियों द्वारा कच्चे जूट की खरीद-बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए, ताकि मिलों को राहत मिल सके और हजारों श्रमिकों की नौकरियां बचाई जा सकें.
मिलों में तेजी से घट रहा जूट का स्टॉक
IJMA के अनुसार, बीते कुछ महीनों में जूट मिलों के पास कच्चे जूट की उपलब्धता तेजी से घट गई है. सिर्फ दिसंबर 2025 में ही मिलों का स्टॉक करीब 1.25 लाख गांठ कम हो गया. दूसरी ओर कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है. दक्षिण बंगाल की टीडीएन-3 ग्रेड जूट की कीमतें बढ़कर करीब 13,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है. इस हालात ने जूट उद्योग के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है.
उत्पादन ठप, हजारों मजदूर बेरोजगार
कच्चे जूट की कमी और ऊंची कीमतों का सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है. कई जूट मिलों को या तो पूरी तरह बंद करना पड़ा है या फिर उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ी है. IJMA का दावा है कि इस वजह से 75 हजार से ज्यादा मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ा है. जूट उद्योग, जो पहले से ही चुनौतियों से जूझ रहा था, अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आ रहा है.
निजी व्यापारियों पर रोक का प्रस्ताव
स्थिति को संभालने के लिए IJMA ने जूट आयुक्त को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि निजी व्यापारियों, डीलरों और स्टॉकिस्टों को 31 मार्च तक अपने पास मौजूद कच्चे जूट का निपटान करने का समय दिया जाए. इसके बाद निजी स्तर पर कच्चे जूट का कोई भी व्यापार अवैध घोषित कर दिया जाए. संगठन का मानना है कि इससे जमाखोरी पर लगाम लगेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी.
मिलों को मिलेगा पर्याप्त स्टॉक
IJMA का अनुमान है कि इस अवधि में जूट मिलें करीब 12 से 15 लाख गांठ जूट की खपत कर लेंगी. इसके बाद मार्च 2026 के अंत तक मिलों के पास तय सीमा के भीतर करीब 7 लाख गांठ का सुरक्षित स्टॉक रह सकता है. इससे मिलों को बिना रुकावट उत्पादन जारी रखने में मदद मिलेगी.
व्यापारियों के पास फंसा है बड़ा हिस्सा
संगठन के मुताबिक, 2025-26 की फसल से निकले कुल कच्चे जूट में से करीब 25 से 30 लाख गांठ अभी भी देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापारियों और बिचौलियों के पास जमा है. IJMA ने सुझाव दिया है कि इस शेष जूट को सरकार द्वारा तय कीमतों पर भारतीय जूट निगम (JCI) को सौंपा जाए. इसके बाद JCI अप्रैल से मिलों को उनकी जरूरत के अनुसार जूट की आपूर्ति करे.
रबी सीजन के लिए जूट बोरियों की चिंता
जूट उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो 2026-27 के रबी सीजन के लिए जूट बोरियों की उपलब्धता भी खतरे में पड़ सकती है. इससे खाद्य निगम और राज्य एजेंसियों को अनाज भंडारण में दिक्कतें आ सकती हैं. IJMA का मानना है कि प्रस्तावित व्यवस्था से न सिर्फ जूट की कीमतें नियंत्रित होंगी, बल्कि घरेलू और निर्यात बाजार भी सुरक्षित रहेंगे.
बैठक में जताई गई गंभीर चिंता
इस संकट को लेकर 14 जनवरी को पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री, उप जूट आयुक्त, ट्रेड यूनियन और उद्योग प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अहम बैठक हुई थी. बैठक में सभी पक्षों ने एक सुर में हालात की गंभीरता को स्वीकार किया और तुरंत सरकारी हस्तक्षेप की मांग की.
अब सरकार के फैसले पर टिकी निगाहें
जूट उद्योग इस वक्त नाजुक मोड़ पर खड़ा है. निजी व्यापार पर रोक और सरकारी निगरानी की मांग को लेकर IJMA ने साफ संदेश दिया है कि अगर जल्द फैसला नहीं हुआ, तो हालात और बिगड़ सकते हैं. अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और जूट उद्योग को संकट से उबारने के लिए कौन सा रास्ता चुनती है.