भारतीय कपड़ा उद्योग को झटका! महंगे कच्चे माल से घटा निर्यात… सरकार से मांगी राहत

कपड़ा मंत्रालय चाहता है कि कच्चे कपास पर लगाया गया 11 प्रतिशत आयात शुल्क हटाया जाए ताकि कपड़ा उद्योग को राहत मिल सके और निर्यात बढ़ाया जा सके. मंत्रालय का तर्क है कि इससे मिलों को सस्ता कपास मिलेगा और उत्पादन लागत कम होगी. हालांकि कृषि मंत्रालय इस फैसले को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 May, 2026 | 02:40 PM

Raw cotton import duty: भारत का कपड़ा और टेक्सटाइल इंडस्ट्री इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. एक तरफ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू उद्योग को कच्चे कपास की ऊंची कीमतों और आयात शुल्क की वजह से परेशानी हो रही है. इसी बीच कपड़ा उद्योग से जुड़ी एक नई रिपोर्ट में सरकार से कच्चे कपास पर आयात शुल्क हटाने की मांग की गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारतीय कपड़ा मिलों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले मजबूत बनाना है, तो उन्हें सस्ती दरों पर कपास उपलब्ध कराना जरूरी होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क की वजह से भारतीय उद्योग एशिया के दूसरे देशों से पिछड़ता जा रहा है.

क्यों उठी आयात शुल्क हटाने की मांग?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, भारतीय कपड़ा परिसंघ की ओर से जारी एक अध्ययन में कहा गया है कि कपास पर आयात शुल्क हटाना बेहद जरूरी हो गया है. यह रिपोर्ट सलाहकार कंपनी घेरजी और अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है.

रिपोर्ट के अनुसार भारत के मुकाबले एशिया के कई देशों को बिना किसी आयात शुल्क के अंतरराष्ट्रीय बाजार से कपास खरीदने की सुविधा मिलती है. ऐसे में भारतीय कपड़ा उद्योग को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जब दूसरे देशों की मिलों को सस्ता कपास मिलता है और भारत में मिलों को महंगा कच्चा माल खरीदना पड़ता है, तो भारतीय उत्पाद महंगे हो जाते हैं. इसका सीधा असर निर्यात और उत्पादन पर पड़ता है.

कपड़ा निर्यात में आई गिरावट

भारत का कपड़ा और टेक्सटाइल इंडस्ट्री देश में रोजगार देने वाले सबसे बड़े क्षेत्रों में शामिल है. लाखों लोग सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं. लेकिन हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कपड़ा और परिधान क्षेत्र का निर्यात 2.2 प्रतिशत घटकर 35.79 अरब डॉलर रह गया. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि उत्पादन लागत बढ़ने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज होने की वजह से यह गिरावट देखने को मिली. उद्योग का मानना है कि यदि समय रहते नीति में बदलाव नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थिति और मुश्किल हो सकती है.

कपड़ा मंत्रालय और कृषि मंत्रालय के बीच मतभेद

कच्चे कपास पर आयात शुल्क हटाने को लेकर सरकार के भीतर भी अलग-अलग राय देखने को मिल रही है. कपड़ा मंत्रालय चाहता है कि कच्चे कपास पर लगाया गया 11 प्रतिशत आयात शुल्क हटाया जाए ताकि कपड़ा उद्योग को राहत मिल सके और निर्यात बढ़ाया जा सके. मंत्रालय का तर्क है कि इससे मिलों को सस्ता कपास मिलेगा और उत्पादन लागत कम होगी. हालांकि कृषि मंत्रालय इस फैसले को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं है. कृषि मंत्रालय किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर किसान संगठनों और उद्योग प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहा है.

सरकार को चिंता है कि अगर आयात शुल्क पूरी तरह हटा दिया गया, तो इसका असर घरेलू कपास किसानों पर पड़ सकता है.

अस्थायी राहत देने पर भी चर्चा

रिपोर्ट के अनुसार कपड़ा मंत्रालय ने यह सुझाव भी दिया है कि आयात शुल्क को स्थायी रूप से नहीं बल्कि कुछ समय के लिए हटाया जा सकता है. खासतौर पर उस अवधि में जब देश में कपास की उपलब्धता कम रहती है और मिलों को उत्पादन के लिए ज्यादा कपास की जरूरत होती है. इससे उद्योग को राहत मिलेगी और किसानों पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. इस मुद्दे पर फिलहाल कपड़ा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और कृषि मंत्रालय के बीच बातचीत जारी है.

कपास मूल्य स्थिरीकरण फंड बनाने का सुझाव

रिपोर्ट में केवल आयात शुल्क हटाने की बात ही नहीं कही गई, बल्कि कपास की कीमतों को स्थिर रखने के लिए एक विशेष फंड बनाने का सुझाव भी दिया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि कपास की कीमतों में तेजी से उतार-चढ़ाव होने से पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होती है. इससे किसानों, व्यापारियों और मिलों सभी को परेशानी होती है.

इसी को देखते हुए “कपास मूल्य स्थिरीकरण फंड” बनाने की सिफारिश की गई है. इसके तहत नवंबर से मार्च के बीच खरीदे गए कपास पर कार्यशील पूंजी के लिए 5 प्रतिशत ब्याज सहायता देने का प्रस्ताव रखा गया है. इससे मिलों को सीजन के दौरान कपास खरीदने और स्टॉक रखने में मदद मिल सकती है.

चीन की तर्ज पर कपास भंडारण की सलाह

रिपोर्ट में चीन जैसे बड़े कपास उत्पादक देशों का उदाहरण देते हुए भारत में भी रणनीतिक कपास भंडार बनाने की बात कही गई है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारतीय कपास निगम को देश की जरूरत के हिसाब से करीब तीन महीने का कपास भंडार रखना चाहिए. इससे बाजार में अचानक कीमत बढ़ने या कमी आने की स्थिति को संभालने में मदद मिलेगी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय कपास निगम को देश के बड़े कपड़ा उद्योग क्षेत्रों के पास स्थित गोदामों से जरूरत के अनुसार कपास उपलब्ध कराना चाहिए.

किसानों की आय बढ़ाने पर भी जोर

रिपोर्ट में केवल उद्योग की समस्याओं की बात नहीं की गई, बल्कि कपास किसानों की स्थिति सुधारने पर भी जोर दिया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए लंबे समय की नीति बनानी होगी. किसानों को बेहतर बीज, नई तकनीक, सिंचाई सुविधा और वैज्ञानिक खेती की जानकारी देना जरूरी है. यदि उत्पादन बढ़ेगा और गुणवत्ता सुधरेगी, तो किसानों को भी बेहतर दाम मिल सकेंगे.

पूरी सप्लाई चेन को साथ लेकर चलने की जरूरत

रिपोर्ट में कहा गया है कि कपास सिर्फ एक कृषि फसल नहीं, बल्कि एक बड़ा औद्योगिक उत्पाद भी है. इसलिए नीति बनाते समय केवल किसानों या उद्योग को नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन को ध्यान में रखना जरूरी है. इसमें किसान, व्यापारी, मिल मालिक, निर्यातक और कपड़ा कंपनियां सभी शामिल हैं.

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