India wheat export 2026: भारत सरकार ने लगभग चार साल बाद गेहूं के निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटाते हुए 25 लाख टन गेहूं बाहर भेजने की अनुमति दी है. इसका मकसद किसानों को बेहतर दाम दिलाना और घरेलू बाजार में गिरती कीमतों को संभालना है. लेकिन बाजार से जुड़ी हकीकत कुछ और कहानी बता रही है. व्यापारियों और विश्लेषकों का मानना है कि इस साल भारत के लिए इतनी बड़ी मात्रा में गेहूं निर्यात करना आसान नहीं होगा, क्योंकि भारतीय गेहूं की कीमत वैश्विक बाजार से काफी ज्यादा है.
MSP बढ़ने से बढ़ी लागत
बिजनेलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाकर 2,585 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है, जो पिछले साल से 160 रुपये ज्यादा है. यही बढ़ी हुई कीमत अब निर्यात के रास्ते में बड़ी बाधा बन रही है. किसान स्वाभाविक रूप से MSP से कम पर बेचने को तैयार नहीं होंगे. ऐसे में निर्यात के लिए उपलब्ध गेहूं की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में अधिक हो जाती है.
व्यापारियों के अनुसार, कांडला बंदरगाह तक राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश से पहुंचाया गया गेहूं 25,200 से 25,500 रुपये प्रति टन पड़ रहा है. डॉलर में इसकी कीमत करीब 285 से 288 डॉलर प्रति टन बैठती है. अगर इसमें पश्चिम एशिया या दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंचाने का लगभग 20 डॉलर प्रति टन भाड़ा जोड़ दिया जाए तो लागत 305 से 308 डॉलर प्रति टन तक पहुंच जाती है. जबकि वैश्विक बाजार में गेहूं की कीमत करीब 260 डॉलर प्रति टन चल रही है. यानी भारतीय गेहूं लगभग 45 डॉलर महंगा पड़ रहा है.
वैश्विक प्रतिस्पर्धा से दबाव
दुनिया के प्रमुख निर्यातक देशों की पेशकश भारत के लिए चुनौती बन रही है. वैश्विक कंपनियां जैसे ओलम इंटरनेशनल, बंज और लुई ड्रेफस मार्च के दूसरे पखवाड़े की आपूर्ति के लिए 286 से 290 डॉलर प्रति टन के बीच गेहूं ऑफर कर रही हैं. वहीं ब्लैक सी क्षेत्र का गेहूं भारतीय गेहूं से लगभग 20 डॉलर सस्ता मिल रहा है.
ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और उत्तर अमेरिका का गेहूं भी बाजार में अच्छी मांग पा रहा है. ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में 2.29 मिलियन टन गेहूं निर्यात किया, जो नवंबर के मुकाबले दोगुना से अधिक था. इंडोनेशिया, चीन और फिलीपींस उसके बड़े खरीदार रहे. ऐसे माहौल में भारतीय गेहूं के लिए जगह बनाना कठिन हो सकता है.
बांग्लादेश बन सकता है सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास एक व्यावहारिक विकल्प बांग्लादेश है. बिहार से सड़क या रेल मार्ग के जरिए भेजा गया गेहूं लगभग 283 डॉलर प्रति टन पड़ सकता है, जो वहां की मौजूदा लैंडिंग कीमत 270 डॉलर के करीब है. हालांकि यहां भी कीमत का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं होता. अनुमान है कि सबसे अच्छी स्थिति में भारत करीब एक लाख टन तक गेहूं बांग्लादेश भेज सकता है. कुछ व्यापारियों का यह भी मानना है कि यदि सरकार-से-सरकार के स्तर पर समझौता हो, तो निर्यात को थोड़ा सहारा मिल सकता है.
रिकॉर्ड भंडार से बढ़ा दबाव
भारत के सामने एक और बड़ी चिंता भंडार की है. 31 मार्च तक गेहूं का समापन स्टॉक लगभग 2.1 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले दस वर्षों में सबसे ज्यादा होगा. अभी भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास 2.53 करोड़ टन से अधिक गेहूं और 3.46 करोड़ टन चावल का रिकॉर्ड भंडार मौजूद है. इसके अलावा मिलिंग के लिए रखा धान भी बड़ी मात्रा में है.
वहीं आने वाली फसल भी अच्छी बताई जा रही है. सरकार ने जलवायु परिवर्तन के असर को देखते हुए किसानों को जलवायु-सहिष्णु किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया था. इसका असर उत्पादन पर दिखा और 2025 में गेहूं उत्पादन बढ़कर लगभग 117.95 मिलियन टन तक पहुंच गया. इससे पहले 2022 में भीषण गर्मी के कारण उत्पादन 110 मिलियन टन से नीचे चला गया था, जिसके बाद निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया था.
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार निर्यात पर सब्सिडी नहीं देती या अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नहीं बढ़तीं, तब तक 25 लाख टन गेहूं निर्यात करना कठिन रहेगा. MSP की वजह से घरेलू लागत ऊंची बनी हुई है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा कड़ी है. ऐसे में भारत को रणनीतिक बाजार चुनने होंगे और संभव हो तो सरकार-से-सरकार समझौतों का रास्ता अपनाना होगा.