Asia Heatwave: एशिया के कई देशों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी अब केवल लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि खेती और पशुपालन के लिए भी गंभीर संकट बन गई है. ब्रिटिश समाचार पत्र द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण कोरिया में इतनी भीषण गर्मी पड़ी कि जमीन के भीतर मौजूद आलू नरम होकर मानो उबले हुए आलू जैसे हो गए. रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और हांगकांग में लगातार बढ़ते तापमान ने फसलों, पशुधन और मत्स्य पालन पर भारी असर डाला है.
दक्षिण कोरिया में आलू की फसल सबसे ज्यादा प्रभावित
द गार्जियन के अनुसार सियोल के उत्तर-पूर्व स्थित यांगगु काउंटी में किसानों को आलू की पूरी फसल बर्बाद होती दिखाई दी. जमीन का तापमान इतना बढ़ गया कि मिट्टी भट्ठी जैसी गर्म हो गई और आलू पककर नरम गांठों में बदल गए. कई किसानों ने बताया कि तीन महीने की मेहनत कुछ दिनों की लू में खत्म हो गई. इसका असर केवल आलू तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तरबूज और स्ट्रॉबेरी जैसी संवेदनशील फसलें भी तेज गर्मी की चपेट में आ गईं.
42.5 डिग्री सेल्सियस ने तोड़ा 120 साल का रिकॉर्ड
रिपोर्ट के मुताबिक 2 अगस्त को दक्षिण कोरिया के यांगसान शहर में तापमान 42.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 1904 में आधुनिक मौसम रिकॉर्ड शुरू होने के बाद देश का सबसे अधिक तापमान है. भीषण गर्मी से कम से कम 31 लोगों की मौत, 9 लाख से अधिक पशुधन और करीब 14 लाख पाली हुई मछलियों की मौत हुई. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने इस स्थिति को देश के इतिहास का अभूतपूर्व संकट बताते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन व्यवस्था की समीक्षा की बात कही है.
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जापान, हांगकांग और चीन भी चपेट में
द गार्जियन के अनुसार जापान में कई स्थानों पर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने पहली बार कोकोशुबी शब्द का उपयोग किया, जिसका अर्थ है अत्यधिक भीषण गर्मी वाला दिन. हांगकांग में 36.9 डिग्री सेल्सियस तापमान 1884 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर रहा. वहीं चीन के शिनजियांग क्षेत्र में पारा 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में रात का तापमान भी 25 डिग्री से नीचे नहीं उतरा.
जलवायु परिवर्तन बना सबसे बड़ी चेतावनी
रिपोर्ट में वैज्ञानिकों के हवाले से कहा गया है कि मानवीय गतिविधियों से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग ने ऐसी गर्मी की घटनाओं को कहीं अधिक संभावित बना दिया है. जापानी वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि मानवजनित जलवायु परिवर्तन न होता तो इस स्तर की गर्मी औसतन दस हजार वर्षों में केवल एक बार देखने को मिलती. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार 1991 से 2025 के बीच एशिया में तापमान बढ़ने की दर पिछले तीन दशकों की तुलना में लगभग दोगुनी रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में लू की घटनाएं और अधिक बार तथा अधिक तीव्र होंगी, इसलिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज कटौती और कृषि के लिए अनुकूलन योजनाएं अब बेहद जरूरी हो गई हैं.