Success Story: जिस खेत में कभी धान की फसल के लिए जुताई से लेकर पडलिंग, खाद, पानी और मजदूरी पर हजारों रुपये खर्च होते थे, उसी खेत ने अब तुषार पांडे को कम लागत में कमाई का नया रास्ता दिखा दिया है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के रहने वाले तुषार ने पारंपरिक धान की खेती से हटकर ढैंचा की खेती शुरू की. पहले सिर्फ एक हेक्टेयर में प्रयोग किया और जब नतीजे उम्मीद से बेहतर मिले तो इस बार करीब 7 हेक्टेयर जमीन पर ढैंचा बो दिया. खास बात यह है कि इससे उन्हें सिर्फ बीज बेचकर कमाई की उम्मीद नहीं है, बल्कि खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का फायदा भी मिल रहा है.
धान की खेती में खर्च और मेहनत ने बदलने पर किया मजबूर
किसान इंडिया से बात चित में तुषार पांडे ने कहा, “B.Com और MBA फाइनेंस की पढ़ाई कर चुके हैं और खेती के साथ फूड एवं ग्रॉसरी का बिजनेस भी करते हैं.” उनके परिवार की खेती में लंबे समय से पारंपरिक तरीके से धान की खेती होती रही है. लेकिन धान की खेती में लगातार बढ़ती लागत और मेहनत को देखते हुए उन्होंने कुछ अलग करने के बारे में सोचा. तुषार बताते हैं कि धान की फसल के लिए पहले जुताई, पडलिंग और लेवलिंग करनी पड़ती थी. इसके बाद पौध लगाने की मजदूरी, DAP, यूरिया, दूसरी खाद, स्प्रे और सिंचाई का खर्च जुड़ता था. करीब 50 बीघे में सिर्फ धान की पौध लगाने की मजदूरी ही लगभग 50 हजार रुपये तक पहुंच जाती थी. मौसम साथ न दे तो ट्यूबवेल से सिंचाई का खर्च अलग.
एक हेक्टेयर के प्रयोग ने दिखाई नई राह
धान की खेती की लागत और अगली फसल में होने वाली देरी को देखते हुए तुषार ने पिछले साल करीब एक हेक्टेयर में ढैंचा की खेती का प्रयोग किया. उनका मकसद था कि खेत खाली भी न रहे और ढैंचा से हरी खाद भी तैयार हो जाए. प्रयोग के बाद उन्हें खेत की अगली फसल में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली. तुषार के मुताबिक, अगली फसल में पहले की तुलना में कम फर्टिलाइजर की जरूरत पड़ी. यही अनुभव उनके लिए टर्निंग पॉइंट बना. इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब अपने बाकी खेतों में भी ढैंचा की खेती को बढ़ाया जाएगा.
7 हेक्टेयर में 60-65 क्विंटल उत्पादन का अनुमान
इस बार तुषार ने करीब 7 हेक्टेयर में ढैंचा की बुवाई की है. कुछ खेतों में इसकी बुवाई जून की शुरुआत में हुई, जबकि कुछ में जुलाई के आसपास. अब फसल पकने की अवस्था में पहुंच रही है और अगले 15 से 20 दिनों में इसके तैयार होने की उम्मीद है. तुषार के अनुमान के मुताबिक एक हेक्टेयर से करीब एक क्विंटल ढैंचा बीज का उत्पादन हो सकता है. इस हिसाब से 7 हेक्टेयर में करीब 70 क्विंटल उत्पादन का अनुमान है. हालांकि वह सुरक्षित अनुमान के तौर पर 60 से 65 क्विंटल उत्पादन मानकर चल रहे हैं. पिछले साल उन्होंने ढैंचा का बीज स्थानीय स्तर पर करीब 120-130 रुपये प्रति किलो में बेचा था. यानी करीब 12 हजार रुपये प्रति क्विंटल. इसी भाव के हिसाब से 60 क्विंटल उत्पादन होने पर लगभग 7.20 लाख रुपये की बिक्री की उम्मीद बनती है. हालांकि वास्तविक कमाई उत्पादन और बाजार भाव पर निर्भर करेगी.
कम लागत में कमाई के साथ मिट्टी को भी फायदा
तुषार के मुताबिक ढैंचा की खेती में इस बार उन्हें खाद, स्प्रे, पडलिंग और अलग से सिंचाई जैसी लागत नहीं करनी पड़ी. उनकी ओर से मुख्य काम बुवाई का रहा और बारिश के मौसम में फसल को प्राकृतिक रूप से पानी मिलता रहा. यही वजह है कि वह ढैंचा को सिर्फ कमाई की फसल नहीं, बल्कि खेत की सेहत सुधारने वाले विकल्प के तौर पर भी देखते हैं. उनका कहना है कि ढैंचा से हरी खाद मिलने के साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद मिलती है और इसके बाद गेहूं, सरसों या आलू जैसी फसलों में भी फायदा मिल सकता है. अब तुषार की योजना तैयार होने वाले ढैंचा बीज को दूसरे किसानों तक पहुंचाने की है. उनका कहना है कि 50-60 क्विंटल बीज वह खुद इस्तेमाल नहीं कर सकते. इसलिए उनकी कोशिश है कि यह बीज जरूरतमंद किसानों तक पहुंचे और दूसरे किसान भी कम लागत वाली इस खेती का फायदा उठा सकें. (किसान इसे खरीदने के लिए के व्हाट्सएप नंबर 9412593402 पर संपर्क कर सकते हैं)