पंजाब में धान बुवाई का फिर टूटा रिकॉर्ड, 90 फीसदी जमीन पर धान की खेती कर रहे किसान

पंजाब में भूजल संकट गहराने के बावजूद किसानों का धान से मोह नहीं टूटा है. इस खरीफ सीजन में धान का रकबा रिकॉर्ड 32.76 लाख हेक्टेयर पहुंच गया, जो कुल खरीफ क्षेत्र का 90 फीसदी से ज्यादा है. विशेषज्ञों ने पानी और फसल विविधीकरण को लेकर चिंता जताई है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 9 Aug, 2026 | 04:45 PM

पंजाब में पानी की कमी और लगातार गिरते भूजल स्तर की चिंता के बावजूद किसानों का धान से मोह कम होता नजर नहीं आ रहा है. इस खरीफ सीजन में धान का रकबा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. राज्य में कुल खरीफ फसलों के करीब 90 फीसदी रकबे पर धान की खेती हो रही है. ऐसे में फसल विविधीकरण की कोशिशों के बीच एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि आखिर किसान धान के चक्र से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे हैं. इस बार पंजाब में धान का रकबा बढ़कर करीब 32.76 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है. यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब राज्य पहले ही तेजी से गिरते भूजल स्तर और पानी की बढ़ती मांग जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है.

36 लाख हेक्टेयर खरीफ रकबे में 90 फीसदी धान

पंजाब में इस साल खरीफ फसलों  का कुल रकबा करीब 36 लाख हेक्टेयर है. इसमें अकेले धान की हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है. यानी राज्य में खरीफ सीजन के दौरान बोई जाने वाली अधिकांश जमीन पर एक ही फसल का कब्जा है. सरकार लंबे समय से किसानों को धान-गेहूं के पारंपरिक चक्र से बाहर निकालने और मक्का, कपास, दालों तथा दूसरी फसलों की खेती बढ़ाने पर जोर दे रही है. इसके बावजूद धान का रकबा लगातार मजबूत बना हुआ है. इससे फसल विविधीकरण की मौजूदा रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं.

कपास का रकबा 2015 के मुकाबले 76 फीसदी घटा

धान के बढ़ते रकबे का असर दूसरी फसलों पर साफ दिखाई देता है. कभी पंजाब का मालवा क्षेत्र कपास उत्पादन  के लिए जाना जाता था, लेकिन अब कपास की खेती काफी सिमट गई है. आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में कपास का रकबा 2015 में करीब 3.35 लाख हेक्टेयर था, जो घटकर इस बार करीब 80 हजार हेक्टेयर रह गया है. यानी करीब 76 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. इससे साफ है कि किसान दूसरी फसलों की तुलना में धान को ज्यादा सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं.

भूजल संकट के बीच बढ़ता धान चिंता की वजह

पंजाब में धान की खेती को लेकर सबसे बड़ी चिंता पानी की खपत है. धान की लगातार खेती से भूजल पर दबाव बढ़ रहा है. केंद्रीय भूजल बोर्ड  की रिपोर्ट भी राज्य में भविष्य के जल संकट को लेकर चेतावनी दे चुकी है. अगर मौजूदा स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले वर्षों में खेती के लिए पानी जुटाना बेहद मुश्किल हो सकता है. यहां तक कि किसानों को सिंचाई के लिए जमीन के बहुत नीचे तक पानी तलाशना पड़ सकता है. ऐसे में धान का बढ़ता रकबा पंजाब के लिए पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों स्तर पर बड़ी चुनौती बन सकता है.

किसान क्यों नहीं छोड़ रहे धान की खेती?

जानकारों के मुताबिक, किसान धान इसलिए छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें दूसरी फसलों में धान जैसी आय और बाजार की गारंटी नजर नहीं आती. किसानों के लिए सिर्फ फसल बदलने की सलाह काफी नहीं है, बल्कि दूसरी फसलों को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना जरूरी है. राज्य सरकार बासमती धान का रकबा बढ़ाने पर भी जोर दे रही है, क्योंकि यह सामान्य धान की तुलना में कम समय में तैयार होता है और पानी की खपत भी अपेक्षाकृत कम होती है. इसके साथ ही डीएसआर तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि फसल विविधीकरण को सफल बनाने के लिए वैकल्पिक फसलों का सुरक्षित बाजार, बेहतर कीमत और खरीद की भरोसेमंद व्यवस्था जरूरी है. जब किसानों को दूसरी फसलों में भी स्थिर आमदनी का भरोसा मिलेगा, तभी पंजाब धान के बढ़ते दबदबे को कम कर पाएगा.

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Published: 9 Aug, 2026 | 04:44 PM