Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ सरकार ने अल नीनो और मॉनसून में देरी की आशंका को देखते हुए एक विशेष योजना तैयार की है. साथ ही किसानों को कम और मध्यम अवधि वाली फसलों की किस्में अपनाने की सलाह दी है. सरकार का कहना है कि इससे कम बारिश और मौसम की अनिश्चितता का असर फसलों पर कम पड़ेगा. खास बात यह है कि मौजूदा वक्त में किसानों को खेती में पानी बचाने वाली नई तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है.
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि विभाग ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में एक विशेष आकस्मिक (कंटीजेंसी) योजना तैयार की है. इस योजना में मॉनसून के देर से आने, जल्दी खत्म होने और लंबे सूखे दौर की संभावना को ध्यान में रखा गया है. इसका उद्देश्य कम बारिश की स्थिति में भी फसलों की सुरक्षा, कृषि उत्पादन बनाए रखना और किसानों की लागत कम करना है. अधिकारियों के अनुसार, किसानों को पारंपरिक रोपाई की बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है. इस तकनीक से सिंचाई के पानी की लगभग 20 प्रतिशत बचत होती है, प्रति एकड़ करीब 5,000 रुपये तक लागत कम होती है और धान की फसल 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है.
ऊंचे इलाकों में कम बारिश की संभावना
अधिकारियों के अनुसार, जिन ऊंचे इलाकों में कम बारिश की संभावना रहती है, वहां किसानों को धान की जगह अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों तथा मूंगफली, तिल और सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलों की खेती करने की सलाह दी गई है. ये फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं और सूखे जैसी परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं. कृषि विभाग ने किसानों को फसलों की बुवाई कतारों में करने की सलाह भी दी है. इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रण और जड़ों के बेहतर विकास में मदद मिलती है, जिससे फसलें सूखे की स्थिति का बेहतर सामना कर सकती हैं. विभाग ने बुवाई से पहले बीज उपचार को अनिवार्य बताया है. यदि 15 जुलाई तक बीजों का अंकुरण नहीं होता है, तो किसानों को सामान्य मात्रा से 10 प्रतिशत अधिक बीज का उपयोग कर दोबारा बुवाई करने की सलाह दी गई है.
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विभाग ने किसानों को जुलाई के अंत तक मूंग और उड़द की बुवाई तथा अगस्त में तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि वाली अरहर की किस्मों की बुवाई करने की सिफारिश की है. साथ ही, कम बारिश की स्थिति में उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने की सलाह भी दी गई है, ताकि फसल की वृद्धि प्रभावित न हो.
दलहनी और तिलहनी की करें खेती
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026 के खरीफ सीजन में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो लंबी अवधि वाले पारंपरिक धान की तुलना में कम अवधि वाली धान किस्में, दलहनी और तिलहनी फसलें किसानों के लिए अधिक लाभदायक साबित हो सकती हैं. ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होती हैं और मौसम की अनिश्चितता का जोखिम भी कम रहता है.
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने की बैठक
इसी संभावना को देखते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने शुक्रवार को एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की. बैठक में खरीफ सीजन की तैयारियों, संभावित मौसम की स्थिति, उर्वरकों और बीजों की उपलब्धता, जल संरक्षण उपायों, सिंचाई प्रबंधन, वैज्ञानिक खेती तकनीकों और ग्रामीण रोजगार योजनाओं की समीक्षा की गई. सरकार का उद्देश्य कम बारिश की स्थिति में भी किसानों को राहत देना और कृषि उत्पादन को बनाए रखना है.