कॉफी और सुपारी किसानों की बढ़ी मुश्किलें, जरूरी फफूंदनाशी हुआ बहुत महंगा… फसल को होगा नुकसान

कई किसान खेती के कामों के लिए प्रवासी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं. लेकिन मजदूरों की कमी के कारण छंटाई, स्प्रे, खाद डालना और निराई जैसे जरूरी काम समय पर नहीं हो पा रहे हैं. अगर जल्द ही मजदूर नहीं लौटे, तो खेती के कामों में देरी हो सकती है, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 29 Apr, 2026 | 10:33 AM

copper sulphate price: खेती-किसानी में लागत लगातार बढ़ती जा रही है और अब एक और बड़ा झटका कॉफी और सुपारी (अरेकेनट) किसानों को लगा है. फसल की सुरक्षा के लिए जरूरी रसायन कॉपर सल्फेट की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे किसानों की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है. खासकर मानसून से पहले जब फसलों पर फफूंद रोगों का खतरा बढ़ता है, तब इसकी जरूरत सबसे ज्यादा होती है.

कॉपर सल्फेट के दाम में भारी उछाल

पिछले एक साल में कॉपर सल्फेट की कीमतों में करीब 70 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है. जहां पहले इसकी कीमत करीब 270 रुपये प्रति किलो थी, वहीं अब यह बढ़कर 450 रुपये प्रति किलो से भी ज्यादा हो गई है. कुछ जगहों पर इसकी कीमत 530 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. इस तेजी के पीछे तांबा (कॉपर) और सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतों में बढ़ोतरी को मुख्य कारण माना जा रहा है.

क्यों जरूरी है कॉपर सल्फेट

कॉपर सल्फेट का इस्तेमाल ‘बोर्डो मिक्सचर’ बनाने में होता है, जो एक अहम फफूंदनाशी (फंगीसाइड) है. यह खासतौर पर कॉफी की अरैबिका किस्म में लीफ रस्ट और ब्लैक रॉट जैसी बीमारियों से बचाने के लिए उपयोग किया जाता है. जिन इलाकों में मानसून के दौरान ज्यादा बारिश होती है, वहां यह दवा फसलों को बचाने के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है.

किसानों की बढ़ी चिंता

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, कॉफी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ सहदेव बालकृष्ण का कहना है कि कॉपर सल्फेट की कीमतों में इस बढ़ोतरी से खेती की लागत काफी बढ़ जाएगी. वहीं कर्नाटक के किसान और पूर्व अध्यक्ष बी. एस. जयराम के अनुसार, पहले से ही बढ़ती लागत और मजदूरों की कमी ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है. उन्होंने बताया कि चुनाव के दौरान असम गए कई प्रवासी मजदूर अभी तक वापस नहीं लौटे हैं, जिससे खेतों में काम करना मुश्किल हो रहा है.

मजदूरों की कमी भी बड़ी चुनौती

कई किसान खेती के कामों के लिए प्रवासी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं. लेकिन मजदूरों की कमी के कारण छंटाई, स्प्रे, खाद डालना और निराई जैसे जरूरी काम समय पर नहीं हो पा रहे हैं. अगर जल्द ही मजदूर नहीं लौटे, तो खेती के कामों में देरी हो सकती है, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा.

सुपारी किसानों पर दोहरी मार

सिर्फ कॉफी ही नहीं, बल्कि सुपारी (अरेकेनट) के किसानों को भी इस बढ़ती कीमत का सामना करना पड़ रहा है. ऑल इंडिया अरेकेनट ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष महेश पुच्छप्पडी के अनुसार, इस साल कॉपर सल्फेट की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है. सुपारी के बागानों में मानसून के दौरान ‘फ्रूट रॉट’ बीमारी से बचाव के लिए फफूंदनाशी स्प्रे करना जरूरी होता है, जिसमें कॉपर सल्फेट अहम भूमिका निभाता है.

पहले से नुकसान झेल रहे किसान

पिछले सीजन में सुपारी किसानों को ‘फ्रूट रॉट’ बीमारी के कारण लगभग 50 प्रतिशत तक उत्पादन का नुकसान हुआ था. इसके अलावा अधिक तापमान के कारण भी फसल प्रभावित हुई है. ऐसे में जब कॉपर सल्फेट महंगा हो गया है, तो किसानों की लागत और बढ़ जाएगी, जिससे उनकी आय पर असर पड़ना तय है.

छोटे किसानों के लिए बढ़ी मुश्किल

महेश पुच्छप्पडी का कहना है कि छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. उनके पास ज्यादा पूंजी नहीं होती, इसलिए महंगे रसायन खरीदना उनके लिए मुश्किल हो जाता है. हालांकि बाजार में कुछ वैकल्पिक उत्पाद उपलब्ध हैं, लेकिन किसान उन्हें इस्तेमाल करने से हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें उनके असर पर पूरा भरोसा नहीं होता.

सहकारी संस्थाएं दे रही राहत

इस बीच कुछ सहकारी संस्थाएं किसानों को राहत देने की कोशिश कर रही हैं. कैंपको (Campco) ने अपने सदस्यों के लिए कॉपर सल्फेट सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराया है. इस साल संस्था अपने सदस्यों को 450 रुपये प्रति किलो की दर से कॉपर सल्फेट दे रही है, जबकि गैर-सदस्यों के लिए यह कीमत 490 रुपये प्रति किलो रखी गई है. पिछले साल यही उत्पाद किसानों को 290 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी दर पर मिला था.

ऐसे में अगर कॉपर सल्फेट की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले समय में कॉफी और सुपारी की खेती और महंगी हो सकती है. इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और किसानों का मुनाफा घट सकता है.

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