Kashmir horticulture: भारत में बागवानी को खेती का सबसे उभरता हुआ क्षेत्र माना जा रहा है, लेकिन हर जगह इसकी तस्वीर एक जैसी नहीं है. जम्मू-कश्मीर का कश्मीर क्षेत्र, जो अपने सेब, अखरोट और अन्य फलों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, वहां भी बागवानी कई चुनौतियों से जूझ रही है. हाल ही में नीति आयोग की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस सच्चाई को सामने रखा है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो इस क्षेत्र की संभावनाएं पूरी तरह से सामने नहीं आ पाएंगी.
पारंपरिक बाग बने कमाई में बाधा
कश्मीर में आज भी ज्यादातर बाग पुराने तरीके से लगाए गए हैं. यहां पेड़ों के बीच दूरी ज्यादा होती है और पारंपरिक किस्मों का इस्तेमाल होता है, जिससे उत्पादन कम होता है. कई बाग ऐसे हैं जो काफी पुराने हो चुके हैं और उनकी उत्पादकता भी घट चुकी है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अब जरूरत है इन पुराने बागों को बदलकर नई तकनीक से हाई-डेंसिटी प्लांटेशन अपनाने की. इसमें छोटे कद के पौधे लगाए जाते हैं, जो कम जगह में ज्यादा फल देते हैं. इससे किसान कम जमीन में ज्यादा कमाई कर सकते हैं.
पानी का संकट और सिंचाई की जरूरत
आज के समय में पानी सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है. कश्मीर में भी यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ रही है. ऐसे में रिपोर्ट में ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई को बढ़ावा देने की बात कही गई है. इस तकनीक से पानी की बचत होती है और पौधों को उतना ही पानी मिलता है जितनी जरूरत होती है. अगर इस दिशा में तेजी से काम नहीं हुआ, तो आने वाले समय में खेती पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.
घटती जमीन और बदलता मौसम
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि खेती की जमीन धीरे-धीरे कम होती जा रही है, क्योंकि इसका उपयोग अन्य कामों के लिए किया जा रहा है. इससे बागवानी का क्षेत्र सीमित होता जा रहा है. इसके साथ ही मौसम में हो रहे बदलाव भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं. कभी ज्यादा बारिश, कभी सूखा और तापमान में उतार-चढ़ाव ये सभी चीजें फसलों को प्रभावित करती हैं और किसानों की मेहनत पर पानी फेर देती हैं.
गलत खेती के तरीके बढ़ा रहे परेशानी
कई किसान अब भी वैज्ञानिक तरीके से खेती नहीं कर रहे हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि रासायनिक खाद और कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा और गलत तरीके से इस्तेमाल हो रहा है. इससे फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और विदेशों में निर्यात करने में भी दिक्कत आती है. इसके अलावा जैविक खेती की बढ़ती मांग के बारे में भी किसानों में पर्याप्त जानकारी नहीं है.
अच्छी गुणवत्ता और टेस्टिंग की कमी
आज के समय में बाजार में वही उत्पाद टिक पाता है, जिसकी गुणवत्ता बेहतर हो. लेकिन कश्मीर में कई जगहों पर उत्पादों की जांच और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है. किसानों को यह जानकारी भी कम है कि फसल की रेजिड्यू टेस्टिंग क्यों जरूरी है. यही वजह है कि कई बार उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वीकार नहीं किए जाते.
बाजार तक पहुंच में दिक्कत
किसान मेहनत से फसल उगाते हैं, लेकिन सही दाम नहीं मिल पाता. इसका एक बड़ा कारण कमजोर बाजार व्यवस्था है. उत्पादन से लेकर बिक्री तक के बीच तालमेल की कमी है. अक्सर व्यापारियों का दबदबा ज्यादा होता है, जबकि किसान संगठनों और सहकारी समितियों की भूमिका सीमित रहती है. इससे किसानों की मोलभाव करने की ताकत कम हो जाती है.
फसल के बाद सबसे ज्यादा नुकसान
कई बार नुकसान फसल उगाने में नहीं, बल्कि उसके बाद होता है. सही तरीके से स्टोरेज न होने, समय पर ट्रांसपोर्ट की कमी और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा न होने से फसल खराब हो जाती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि कश्मीर में कोल्ड चेन और आधुनिक भंडारण सुविधाओं की भारी कमी है, जिससे किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
नई तकनीक अपनाने में देरी
आज खेती में नई-नई तकनीकें आ रही हैं, लेकिन कश्मीर में इनका इस्तेमाल अभी भी सीमित है. किसानों को सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण नहीं मिल पाने के कारण वे इन तकनीकों को अपनाने में पीछे रह जाते हैं. अगर आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाया जाए, तो उत्पादन बढ़ सकता है और गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है.
ऐसे में कश्मीर की बागवानी में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसके लिए सही दिशा में काम करना जरूरी है. पुराने बागों को आधुनिक बनाना, पानी की बचत करने वाली तकनीकों को अपनाना, बाजार को मजबूत करना और किसानों को जागरूक बनाना समय की जरूरत है.
अगर इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो कश्मीर की बागवानी न केवल किसानों की आय बढ़ा सकती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती दे सकती है.