लहसुन की फसल में चुपचाप फैल रही ये खतरनाक बीमारी! समय रहते नहीं संभले तो हो सकता है भारी नुकसान

Lehsun Ki Kheti: लहसुन की फसल तैयार होने के साथ ही कई इलाकों में जड़ सड़न और फफूंद की समस्या तेजी से फैल रही है. समय पर पहचान और सही दवा का उपयोग न करने पर पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है. ऐसे में यहां जानें बीमारी के लक्षण, बचाव के उपाय और कैसे संतुलित सिंचाई व ड्रेंचिंग विधि से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 1 Mar, 2026 | 02:48 PM

Garlic Farming: देश के कई हिस्सों में लहसुन की फसल पककर तैयार हो चुकी है और किसान खुदाई में जुट गए हैं. मंडियों में आवक बढ़ने से अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है. लेकिन देर से बुवाई करने वाले किसानों के सामने इस समय एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि, खेतों में खड़ी फसल में जड़ सड़न और फफूंद का प्रकोप तेजी से फैल रहा है. यदि समय रहते इसका उपचार नहीं किया गया तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है.

ऐसे पहचानें जड़ सड़न के लक्षण

डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि, इस बीमारी की शुरुआत जड़ों के रंग बदलने से होती है. सामान्य रूप से सफेद दिखने वाली जड़ें भूरी या काली पड़ने लगती हैं. धीरे-धीरे जड़ें कमजोर हो जाती हैं और उनकी संख्या कम होने लगती है. पौधे की बढ़वार रुक जाती है और गांठों का आकार छोटा रह जाता है. गंभीर स्थिति में लहसुन की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ता है.

फफूंद नियंत्रण के कारगर उपाय

विशेषज्ञों के अनुसार, जड़ सड़न और फफूंद को नियंत्रित करने के लिए (थियोफेनेट मिथाइल) Thiophanate Methyl 70 फीसदी W.P. का प्रयोग लगभग 500 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में किया जा सकता है. इसे खाद में मिलाकर या ड्रेंचिंग विधि से जड़ों के पास डालना प्रभावी माना जाता है. (मेटालैक्सिल) Metalaxyl 35 फीसदी भी फफूंद नियंत्रण में उपयोगी है, जिसे 250 ग्राम प्रति बीघा की दर से दिया जा सकता है. समय पर इन दवाओं का प्रयोग करने से फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

जड़ों में कीट प्रकोप से बचाव

कई बार जड़ों में छोटे कीट भी दिखाई देते हैं, जो पौधे को और कमजोर बना देते हैं. ऐसी स्थिति में (थियामेथोक्स) Thiamethoxam 25 फीसदी WG 100 से 200 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में उपयोग किया जा सकता है.

जड़ों के बेहतर विकास के लिए Humic 98 का प्रयोग लाभकारी है. इससे नई जड़ें तेजी से विकसित होती हैं और पौधा मजबूत बनता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है.

सिंचाई और दवा देने का सही तरीका

इस समय अधिक सिंचाई से बचना बेहद जरूरी है, क्योंकि ज्यादा नमी फफूंद के प्रसार को बढ़ा सकती है. दवाइयों का प्रयोग ड्रेंचिंग विधि से करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं, क्योंकि दवा सीधे जड़ों तक पहुंचती है.

यदि किसान शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें और तुरंत सही कदम उठाएं, तो लहसुन की फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है. संतुलित सिंचाई, उचित दवा और जड़ों की देखभाल से अच्छी गुणवत्ता वाली पैदावार हासिल की जा सकती है, जिससे बाजार में बेहतर दाम मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.

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