सिर्फ 10 किलो बीज में बंपर उत्पादन! मक्का की मेड़ विधि से खेती करने वाले किसानों को मिल रहा बड़ा फायदा

Maize Farming Tips: मक्का की मेड़ विधि से बुवाई किसानों के लिए फायदेमंद तकनीक मानी जा रही है. इससे खेत में जलभराव नहीं होता, पानी की बचत होती है और फसल की बढ़वार बेहतर होती है. बेड प्लांटर मशीन से बुवाई आसान हो जाती है और कम बीज में अच्छी पैदावार मिलती है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 24 May, 2026 | 11:51 AM

Maize Ridge Sowing Method: मौसम में लगातार बदलाव और खेती का खर्च बढ़ने की वजह से किसान अब ऐसे तरीके अपनाना चाहते हैं, जिनसे कम लागत में ज्यादा और अच्छी पैदावार मिल सके. इसी को देखते हुए मक्का की खेती में ‘मेड़ विधि’ काफी लोकप्रिय हो रही है. बिहार कृषि विभाग के मुताबिक इस तरीके से पानी की बचत होती है, खेत में पानी नहीं रुकता और फसल की बढ़वार भी बेहतर होती है.

इस विधि में खेत को ऊंची-नीची पट्टियों यानी मेड़ों के रूप में तैयार किया जाता है. मेड़ों पर मक्का बोई जाती है, जिससे पौधों को जरूरत के हिसाब से नमी मिलती रहती है. अगर ज्यादा बारिश हो जाए तो पानी खेत में जमा नहीं होता और आसानी से निकल जाता है.

अधिक बारिश में भी सुरक्षित रहती है फसल

मक्का की खेती में सबसे बड़ी दिक्कत खेत में पानी भरने की होती है. ज्यादा बारिश होने पर पानी खेत में रुक जाता है, जिससे पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है. इससे पैदावार पर भी असर पड़ता है. लेकिन अगर किसान मेड़ विधि से मक्का की बुवाई करें, तो खेत में जमा अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल जाता है. इस तरीके में पौधे ऊंची मेड़ों पर लगाए जाते हैं, इसलिए जलभराव की समस्या कम होती है और फसल सुरक्षित रहती है. साथ ही पौधों की बढ़वार भी अच्छी होती है.

बेड प्लांटर मशीन से आसान बुवाई

कृषि विभाग के मुताबिक, मक्का की मेड़ विधि से बुवाई करने के लिए किसान बेड प्लांटर मशीन का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस मशीन से खेत तैयार करने और बीज बोने का काम जल्दी और आसानी से हो जाता है. इस तकनीक में एक एकड़ खेत के लिए करीब 10 किलो बीज की जरूरत पड़ती है. खास बात यह है कि इसमें बीज कम लगता है और पौधों के बीच सही दूरी बनी रहती है. इससे पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और फसल का उत्पादन अच्छा होता है.

खेत की तैयारी और खाद प्रबंधन

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मक्का की मेड़ विधि अपनाने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करना बहुत जरूरी होता है, ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और बीज आसानी से जम सके. खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ करीब 30 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) डालने की सलाह दी जाती है. इससे मिट्टी में जरूरी पोषक तत्व बढ़ते हैं और फसल की बढ़वार अच्छी होती है.

वहीं बुवाई के समय करीब 50 किलो डीएपी (DAP) प्रति एकड़ मशीन के जरिए डालना फायदेमंद माना जाता है. इससे पौधों को शुरुआत में जरूरी पोषण मिलता है, जिससे उनकी जड़ें मजबूत होती हैं और फसल अच्छी तरह विकसित होती है.

खरपतवार नियंत्रण और यूरिया का सही उपयोग

मक्का की अच्छी पैदावार के लिए खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी होता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बुवाई के 15 से 20 दिन बाद टेम्बोट्रियोन और एट्राजीन का छिड़काव करने से खरपतवार की समस्या कम की जा सकती है. इसके बाद 20 से 25 दिन पर प्रति एकड़ लगभग 40 किलोग्राम यूरिया डालना चाहिए. वहीं, 45 से 50 दिन बाद फिर 50 किलोग्राम यूरिया और 65 से 70 दिन बाद 25 किलोग्राम यूरिया देने की सलाह दी जाती है.

क्यों फायदेमंद है मेड़ विधि?

मेड़ विधि से मक्का की खेती करने पर किसानों को कई फायदे मिलते हैं. इस तरीके में पानी की कम जरूरत पड़ती है, जिससे सिंचाई का खर्च घटता है और पानी की बचत होती है. साथ ही फसल में रोग लगने का खतरा भी कम रहता है और पौधों की जड़ें ज्यादा मजबूत बनती हैं. इस विधि में खेत में हवा और नमी का संतुलन बना रहता है, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन बढ़ने की संभावना ज्यादा रहती है. अगर किसान समय पर खाद दें, सही तरीके से सिंचाई करें और खरपतवार नियंत्रण का ध्यान रखें, तो मेड़ विधि से मक्का की खेती काफी फायदेमंद और मुनाफे वाली साबित हो सकती है.

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