देशभर में खरीफ सीजन की बुवाई का समय चल रहा है. ऐसे में मूंग और उड़द की खेती करने वाले किसानों के लिए यह सबसे उपयुक्त समय माना जाता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, यदि किसान बुवाई से पहले बीज का सही तरीके से उपचार करें, खेत में जल निकासी का ध्यान रखें और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाएं, तो फसल को कई रोगों से बचाया जा सकता है. इससे अंकुरण बेहतर होता है, पौधे स्वस्थ रहते हैं और उत्पादन के साथ किसानों की आय भी बढ़ती है.
बीज उपचार से होगी अच्छी शुरुआत, रोगों से मिलेगा बचाव
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार मूंग और उड़द की अच्छी पैदावार के लिए सबसे पहले खेत का सही चयन करना जरूरी है. इन फसलों में जलभराव सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाता है, इसलिए ऐसे खेतों का चयन करें जहां पानी आसानी से निकल सके. बुवाई से पहले बीजों का उपचार अवश्य करें. इसके लिए अनुशंसित फफूंदनाशक के साथ राइजोबियम कल्चर का उपयोग करना चाहिए. इससे बीजों का अंकुरण बेहतर होता है, जड़ों का विकास मजबूत होता है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. बीज उपचार करने से शुरुआती अवस्था में लगने वाले कई फफूंदजनित रोगों का खतरा भी काफी कम हो जाता है.
लाइन बुवाई और सही दूरी से मिलेगा ज्यादा उत्पादन
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार बताते हैं कि मूंग और उड़द की बुवाई हमेशा लाइन विधि से करनी चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 10 सेंटीमीटर रखना लाभदायक रहता है. बीजों को 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए. यदि बुवाई के बाद तेज बारिश की संभावना हो तो बीजों को थोड़ा अधिक गहराई पर बोया जा सकता है, ताकि वे बहने से बच सकें. बुवाई के लिए सीड ड्रिल का उपयोग करने से बीज समान दूरी और सही गहराई पर लगते हैं, जिससे फसल का विकास बेहतर होता है.
खरपतवार, पोषण और कीट प्रबंधन पर रखें नजर
विशेषज्ञों के अनुसार अधिक उत्पादन के लिए संतुलित पोषक तत्वों का प्रयोग जरूरी है. बुवाई के समय खेत में अनुशंसित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और सल्फर का उपयोग करें. बुवाई के बाद शुरुआती 20 से 25 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें. समय पर खरपतवार हटाने से उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है. इसके साथ ही पीला मोजेक वायरस और अन्य कीटों की नियमित निगरानी करें तथा आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाएं. फूल आने और फलियां बनने के समय बारिश कम होने पर हल्की सिंचाई करना लाभदायक रहता है. वहीं एनपीके और सूक्ष्म पोषक तत्वों का पत्तियों पर छिड़काव करने से दानों की गुणवत्ता और फलियों का विकास बेहतर होता है.
कम समय में तैयार होगी फसल
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार मूंग और उड़द दलहनी फसलें हैं, जो हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर करती हैं. इससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और अगली फसल को भी इसका लाभ मिलता है. ये फसलें सामान्यतः 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाती हैं. बाजार में दालों की लगातार अच्छी मांग बनी रहती है, इसलिए किसानों को इनका बेहतर दाम मिलने की संभावना रहती है. सही तकनीक, समय पर बीज उपचार, संतुलित पोषण और नियमित निगरानी अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं और अपनी आय में अच्छी बढ़ोतरी कर सकते हैं.