Powdery Mildew in Mango: भारत को आम का देश कहा जाता है. यहां दशहरी, लंगड़ा, चौसा, अल्फांसो जैसी कई किस्में बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं. लाखों किसान अपनी आजीविका के लिए आम की बागवानी पर निर्भर हैं. लेकिन जितना यह फल स्वादिष्ट है, उतना ही संवेदनशील भी है. आम के बागों में कई तरह की बीमारियां लगती हैं, जिनमें पाउडरी मिल्ड्यू सबसे खतरनाक मानी जाती है. अगर समय पर इसकी पहचान और इलाज न किया जाए तो यह पूरी फसल को लगभग खत्म कर सकती है. कई बार उत्पादन 80 से 100 प्रतिशत तक गिर जाता है.
क्या है पाउडरी मिल्ड्यू रोग
सरकारी वेबसाइट ppqs.gov.in के अनुसार, पाउडरी मिल्ड्यू एक फफूंद जनित बीमारी है. इसे आम बोलचाल में “सफेद धूल रोग” भी कहा जाता है, क्योंकि इससे प्रभावित हिस्सों पर सफेद चूर्ण जैसा पाउडर दिखाई देता है. यह रोग मुख्य रूप से आम के फूलों, कोमल पत्तियों और छोटे फलों पर हमला करता है. जब पेड़ों पर बौर आता है, उसी समय यह बीमारी तेजी से फैलती है और फल बनने की प्रक्रिया को रोक देती है.
यह रोग हवा के जरिए फैलता है. फफूंद के बीजाणु वातावरण में मौजूद रहते हैं और अनुकूल मौसम मिलते ही पत्तियों व फूलों पर जम जाते हैं. हल्की ठंड और ज्यादा नमी वाला मौसम इस बीमारी के लिए सबसे अनुकूल होता है. फरवरी से मार्च के बीच जब तापमान 10 से 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है और सुबह-शाम नमी बनी रहती है, तब इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है.
शुरुआती लक्षण कैसे पहचानें
इस बीमारी की शुरुआत आमतौर पर नई पत्तियों से होती है. पत्तियों पर हल्के भूरे या स्लेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे सफेद चूर्ण में बदल जाते हैं. बाद में पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं और मुड़ जाती हैं. कुछ मामलों में पत्तियों का रंग जामुनी भी हो जाता है.
सबसे ज्यादा नुकसान बौर पर होता है. फूलों पर सफेद पाउडर जैसा परत जम जाती है, जिससे फूल कमजोर होकर झड़ने लगते हैं. फल बनने की प्रक्रिया रुक जाती है. अगर छोटे फल बन भी जाएं तो वे गिर जाते हैं या ठीक से विकसित नहीं हो पाते. इससे बाग में पैदावार बहुत कम हो जाती है.
क्यों बढ़ रहा है खतरा
आजकल मौसम में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है. कभी ज्यादा नमी, तो कभी अचानक तापमान में गिरावट या बढ़ोतरी. ऐसे बदलते मौसम में पाउडरी मिल्ड्यू का प्रकोप ज्यादा देखने को मिल रहा है. जिन बागों में पेड़ बहुत घने लगे होते हैं और हवा का संचार ठीक से नहीं होता, वहां यह बीमारी और तेजी से फैलती है.
असंतुलित खाद का उपयोग भी एक कारण है. यदि नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा दे दी जाए तो पेड़ों में कोमल वृद्धि बढ़ती है, जो इस रोग के लिए आसान निशाना बन जाती है.
कैसे करें बचाव
इस बीमारी से बचाव के लिए सबसे जरूरी है नियमित निगरानी. बौर आने के समय किसानों को अपने बाग का बार-बार निरीक्षण करना चाहिए. जैसे ही पत्तियों या फूलों पर सफेद चूर्ण दिखाई दे, तुरंत कार्रवाई करें.
संक्रमित पत्तियों और बौर को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए ताकि रोग का फैलाव कम हो. बाग में साफ-सफाई बनाए रखना भी जरूरी है. गिरी हुई पत्तियों को हटाएं और पेड़ों के बीच उचित दूरी रखें, ताकि हवा का प्रवाह बना रहे.
खाद का संतुलित उपयोग करें. एनपीके का सही अनुपात पेड़ों को मजबूत बनाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है. जैविक तरीके अपनाना भी फायदेमंद होता है. नीम आधारित घोल का छिड़काव शुरुआती अवस्था में काफी असरदार साबित हो सकता है.
यदि रोग ज्यादा फैल जाए तो विशेषज्ञ की सलाह से उपयुक्त फफूंदनाशक का छिड़काव करना चाहिए. छिड़काव सुबह या शाम के समय करें, जब हवा कम हो और धूप तेज न हो. आमतौर पर 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो-तीन बार छिड़काव करने से रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है.
समय पर सावधानी ही है सबसे बड़ा उपाय
पाउडरी मिल्ड्यू ऐसा रोग है जो चुपचाप पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है. इसलिए बागवानों को बौर निकलने के समय विशेष सतर्क रहना चाहिए. थोड़ी सी लापरवाही भी भारी नुकसान का कारण बन सकती है.
अगर किसान समय रहते पहचान कर लें और सही प्रबंधन अपनाएं, तो इस बीमारी से फसल को बचाया जा सकता है. स्वस्थ बाग, संतुलित पोषण और नियमित निगरानी ही अच्छी पैदावार की कुंजी है. आम की मिठास तभी बरकरार रहेगी, जब किसान रोगों से सजग रहकर अपने बागों की सही देखभाल करेंगे.