Vegetable Cultivation: पारंपरिक फसलों के मुकाबले अब किसान सब्जी खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. इनमें तोरी की खेती किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बनकर उभरी है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, सही किस्म, वैज्ञानिक तकनीक और उचित प्रबंधन अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन और अच्छा मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं. तोरी की खेती की खास बात यह है कि इसमें निवेश कम होता है, जबकि लगातार उत्पादन मिलने से किसानों की आय भी बनी रहती है.
पौध तैयार कर रोपाई करने से मिलता है फायदा
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, तोरी की खेती में सीधे बीज बोने की बजाय पहले पौध तैयार कर खेत में रोपाई करने से बेहतर परिणाम मिलते हैं. इस तकनीक से पौधों की जीवित रहने की क्षमता बढ़ जाती है और शुरुआती अवस्था में होने वाला नुकसान कम होता है. साथ ही पौधों को मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों और कीट-रोगों से भी काफी हद तक बचाया जा सकता है. मजबूत पौध खेत में तेजी से विकसित होती है, जिससे फसल की बढ़वार और उत्पादन दोनों में सुधार देखने को मिलता है.
मचान विधि से बढ़ती है गुणवत्ता और पैदावार
तोरी की खेती में मचान या ट्रेलिस विधि को काफी प्रभावी माना जाता है. इस तकनीक में बेलों को ऊपर की ओर सहारा दिया जाता है, जिससे फल जमीन के संपर्क में नहीं आते. इससे फल साफ, आकर्षक और अच्छी गुणवत्ता वाले बनते हैं. इसके अलावा खेत में हवा का प्रवाह बेहतर बना रहता है, जिससे रोगों का खतरा कम होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, मचान विधि अपनाने से पैदावार बढ़ती है और बाजार में बेहतर गुणवत्ता के कारण किसानों को अच्छे दाम मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.
45 दिन में शुरू होती तुड़ाई, कई महीनों तक मिलता है उत्पादन
तोरी की उन्नत किस्में बुवाई के लगभग 45 से 50 दिनों बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं. इसके बाद फसल कई महीनों तक लगातार उत्पादन देती रहती है. नियमित अंतराल पर तुड़ाई करने से नई फलियां तेजी से विकसित होती हैं और उत्पादन बना रहता है. वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में बाजार भाव सामान्य हैं, लेकिन मांग बढ़ने पर किसानों को बेहतर कीमत मिल सकती है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से तोरी की खेती करें, तो यह फसल कम समय में अधिक लाभ देने वाली साबित हो सकती है और उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.