खरीफ बुवाई दौरान आलू किसानों के लिए बड़ी चेतावनी जारी की गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI), शिमला ने कहा है कि मौजूदा मौसम को देखते हुए लेट ब्लाइट (झुलसा रोग) तेजी से फैल सकता है. संस्थान ने हिमाचल प्रदेश के किसानों को सतर्क रहने और समय रहते बचाव के उपाय करने की सलाह दी है. (ICAR-CPRI) का कहना है कि यह रोग फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टेंस (Phytophthora infestans) नामक फफूंद से फैलता है और आलू की सबसे खतरनाक बीमारियों में माना जाता है. इससे खरीफ सीजन की आलू फसल में 30 से 50 फीसदी तक नुकसान हो सकता है. इस रोग में पत्तियों पर पहले गहरे हरे, पानी से भीगे जैसे धब्बे बनते हैं, जो बाद में भूरे या काले हो जाते हैं. तनों पर भी धब्बे दिखाई देते हैं और आलू के कंद लाल-भूरे रंग के होकर सड़ने लगते हैं.
ICAR-CPRI द्वारा विकसित इंडो-ब्लाइटकास्ट (Indo-Blightcast) पूर्वानुमान मॉडल के अनुसार, वर्तमान मौसम झुलसा रोग के फैलने के लिए अनुकूल है. आने वाले दिनों में इसका प्रकोप बढ़ सकता है. इसलिए राज्य के सभी आलू किसानों को नियमित रूप से फसल की निगरानी करने और बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखते ही तुरंत कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेने को कहा गया है.
झुलसा रोग से बचाव की अपील
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, पौध संरक्षण विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव शर्मा ने किसानों से समय रहते झुलसा रोग से बचाव के उपाय अपनाने की अपील की है. उन्होंने कहा कि जिन खेतों में अभी तक रोग के लक्षण नहीं दिखे हैं और फफूंदनाशक का छिड़काव नहीं किया गया है, वहां किसान मैनकोजेब (Mancozeb) या क्लोरोथालोनिल (Chlorothalonil) युक्त फफूंदनाशक का छिड़काव करें. इसके लिए प्रति हेक्टेयर 2 से 2.5 किलोग्राम दवा को 1,000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है.
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रोग दिखने पर तुरंत करें यह छिड़काव
डॉ. शर्मा ने कहा कि अगर खेत में झुलसा रोग के लक्षण दिखाई देने लगें तो किसान तुरंत प्रभावी फफूंदनाशकों का छिड़काव करें. इसके लिए डाइमेथोमॉर्फ अमेटोक्ट्राडिन + डाइमेथोमॉर्फ, डाइमेथोमॉर्फ + मैनकोजेब, फ्लुओपिकोलाइड + प्रोपामोकार्ब (Fluopicolide + Propamocarb) या एजोक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल जैसे फफूंदनाशकों का कृषि विशेषज्ञों की सलाह और निर्धारित मात्रा के अनुसार छिड़काव करें, ताकि बीमारी को फैलने से रोका जा सके.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञों के अनुसार, झुलसा रोग से बचाव के लिए फफूंदनाशक का छिड़काव आमतौर पर हर 10 दिन के अंतराल पर किया जा सकता है. हालांकि, यदि बीमारी तेजी से फैल रही हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार छिड़काव का अंतराल बदला जा सकता है. किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि वे बार-बार एक ही फफूंदनाशक का इस्तेमाल न करें, बल्कि अलग-अलग दवाओं का उपयोग करें. साथ ही, हर छिड़काव के साथ 0.1 फीसदी स्टिकर (करीब 1 मिली प्रति लीटर पानी) मिलाएं, ताकि दवा पौधों पर अच्छी तरह चिपक सके. संस्थान ने किसानों को खेतों में पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की भी सलाह दी है. इससे खेत में नमी कम रहेगी और झुलसा रोग के फैलने का खतरा भी घटेगा.