Fish Farming : कहते हैं कि अगर हौसला बुलंद हो और मेहनत में ईमानदारी हो, तो बंजर जमीन से भी सोना उगाया जा सकता है. बिहार के सीतामढ़ी जिले के किसानों ने कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया है, लेकिन जमीन पर नहीं बल्कि पानी में. कभी मछली के लिए दूसरे राज्यों का मुंह ताकने वाला सीतामढ़ी आज मछली उत्पादन में ऐसा सुपरस्टार बनकर उभरा है कि इसकी गूंज अब सरहद पार नेपाल और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश तक सुनाई दे रही है. जिले के तालाबों से निकलने वाली ताजी मछलियां अब केवल स्थानीय थालियों की शोभा नहीं बढ़ा रहीं, बल्कि बड़े बाजारों में अपना सिक्का जमा रही हैं.
आत्मनिर्भरता की नई कहानी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक दौर था जब सीतामढ़ी के बाजारों में बिकने वाली ज्यादातर मछलियां आंध्र प्रदेश या पश्चिम बंगाल से ट्रकों में भरकर आती थीं. लोग मजबूरी में कई दिनों की बासी और बर्फ में दबी मछली खाते थे. लेकिन पिछले सात सालों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. जिले के मत्स्य पालकों ने वैज्ञानिकों की सलाह मानी और नई तकनीक को अपनाया. आज नतीजा यह है कि सीतामढ़ी न केवल मछली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है, बल्कि अब यहाँ से भारी मात्रा में मछलियां बाहर भेजी जा रही हैं. अब बाहर से मछली आने का सिलसिला लगभग थम सा गया है.
3172 हेक्टेयर में फैली नीली क्रांति
सीतामढ़ी की इस कामयाबी के पीछे यहां के विशाल जल संसाधन का सही इस्तेमाल है. जिले के लगभग 3172 हेक्टेयर जल क्षेत्र में आज मछली पालन का काम जोरों पर है. वैज्ञानिक तरीके से मछली पालने का फायदा यह हुआ है कि हर साल उत्पादन में 1 से 2 टीएमटी (TMT) की बढ़ोतरी हो रही है. सरकार और जिला मत्स्य विभाग की ओर से मिलने वाले प्रशिक्षण ने किसानों को मछली का डॉक्टर बना दिया है. तालाब की खुदाई से लेकर बीज डालने और चारे के प्रबंधन तक, हर कदम पर आधुनिकता का असर दिख रहा है.
नेपाल से लेकर यूपी तक सीतामढ़ी का स्वाद
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सीतामढ़ी की भौगोलिक स्थिति का फायदा भी यहाँ के मछली कारोबार को मिल रहा है. जिले की सीमा नेपाल से सटी होने के कारण यहां की ताजी मछलियों की भारी डिमांड नेपाल के बाजारों में रहती है. इसके अलावा, बेहतर ट्रांसपोर्ट के जरिए यहाँ की मछलियां उत्तर प्रदेश के शहरों तक भी पहुँच रही हैं. व्यापारियों का कहना है कि सीतामढ़ी की मछलियां ताजी और स्वादिष्ट होती हैं, इसलिए ग्राहक इन्हें हाथों-हाथ लेते हैं. इस एक्सपोर्ट ने स्थानीय किसानों की जेबें भी गर्म कर दी हैं.
युवाओं के लिए बना रोजगार का लकी चार्म
मछली पालन केवल व्यापार नहीं, बल्कि सीतामढ़ी के युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया बन गया है. खेती-बारी से मायूस होकर बाहर पलायन करने वाले कई युवा अब अपने गांव लौटकर तालाब खुदवा रहे हैं. जिला मत्स्य अधिकारी के अनुसार, तकनीकी सहायता और समय-समय पर मिलने वाली ट्रेनिंग ने युवाओं में नया विश्वास जगाया है. आज सीतामढ़ी बिहार में ब्लू रिवोल्यूशन यानी नीली क्रांति का एक मजबूत रोल मॉडल बनकर उभरा है.