Ketosis Disease Prevention Tips : दूध देने वाले पशुओं की सेहत अगर बिगड़ जाए, तो इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है. खासकर दूध देने के बाद के शुरुआती महीनों में कई बार पशु धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं, दूध कम देने लगते हैं और सुस्त नजर आते हैं. कई पशुपालक इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर एक गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है. पशुपालन विभाग के अनुसार, दुधारू पशुओं में कीटोसिस नामक रोग तेजी से देखने को मिल रहा है, जो समय पर न संभाला जाए तो बड़ा आर्थिक नुकसान करा सकता है.
क्या है कीटोसिस रोग
बिहार पशुपालन विभाग के अनुसार, कीटोसिस बीमारी, अगरआम बोल-चाल की भाषा में शर्करा की कमी से होने वाला रोग कहा जाता है. यह बीमारी ज्यादातर दुधारू पशुओं में पाई जाती है. खास बात यह है कि यह रोग आमतौर पर दूध देने के बाद शुरुआती 2 से 3 महीनों के भीतर होने की संभावना ज्यादा रहती है. इस दौरान पशु के शरीर में ऊर्जा की मांग बढ़ जाती है, लेकिन अगर उसे सही पोषण न मिले तो शरीर में शर्करा की कमी हो जाती है. यही कमी धीरे-धीरे कीटोसिस रोग को जन्म देती है.
शुरुआती लक्षण जिन्हें न करें नजरअंदाज
कीटोसिस रोग की पहचान शुरुआती लक्षणों से ही की जा सकती है. इस बीमारी में सबसे पहले पशु की भूख कम हो जाती है. इसके साथ ही दूध का उत्पादन भी घटने लगता है. पशु पहले की तुलना में सुस्त दिखाई देता है और ज्यादा समय बैठा रहता है. कई मामलों में गोबर लसदार और चिपचिपा हो जाता है. ये संकेत बताते हैं कि पशु के शरीर में कुछ गड़बड़ चल रही है और तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.
रोग बढ़ने पर दिखते हैं गंभीर संकेत
अगर समय रहते इस बीमारी पर ध्यान न दिया जाए, तो कीटोसिस धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लेता है. पशु का शारीरिक वजन तेजी से गिरने लगता है. कुछ मामलों में पाइका नामक लक्षण दिखाई देता है, जिसमें पशु मिट्टी, लकड़ी या अन्य कठोर चीजों को खाने की कोशिश करता है. इसके अलावा पीठ में कूबड़ आना और चलने-फिरने में परेशानी भी देखने को मिलती है. इस स्थिति में पशु पूरी तरह कमजोर हो सकता है.
बचाव और समय पर देखभाल है जरूरी
बिहार पशुपालन विभाग के अनुसार, कीटोसिस से बचाव के लिए दुधारू पशुओं को संतुलित और ऊर्जा से भरपूर आहार देना बेहद जरूरी है. दूध देने के बाद के शुरुआती महीनों में पशु की नियमित निगरानी करें. अगर भूख या दूध में कमी नजर आए, तो इसे हल्के में न लें. समय पर पहचान और सही देखभाल से इस बीमारी को आसानी से काबू में किया जा सकता है. पशुपालकों को सलाह है कि किसी भी लक्षण के दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें, ताकि पशु स्वस्थ रहे और दूध उत्पादन प्रभावित न हो.