मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में देसी तरीके से मुर्गी पालन कर किसान नई आर्थिक राह बना रहे हैं. खासकर वनराजा नस्ल के मुर्गों ने ग्रामीण क्षेत्रों में पोल्ट्री फार्मिंग को नया जीवन दे दिया है. अब किसान इस मुर्गे का पालन कम लागत, कम देखभाल और अधिक उत्पादन के लिए कर रहे हैं. इसका उपयोग अंडा और मांस दोनों के लिए किया जा रहा है, जिससे यह ड्यूल परपज नस्ल के रूप में उभरा है.
कम खर्च, कम झंझट
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वनराजा नस्ल के मुर्गे को बिना किसी विशेष बुनियादी ढांचे के भी पाला जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में घर के पीछे की खुली जगह में इसे बैकयार्ड पोल्ट्री के रूप में पालना बेहद आसान है. इस मुर्गे के लिए न तो महंगे फीड की जरूरत होती है और न ही स्पेशल केयर की. ये मुर्गे कीड़े-मकोड़े, केंचुए, कूड़ा-करकट और बचे-खुचे अनाज से अपना भोजन खुद तलाश कर लेते हैं. इससे किसान का फीड खर्च लगभग खत्म हो जाता है.
तंदुरुस्त, ताकतवर और कुपोषण के खिलाफ हथियार
वनराजा मुर्गा ना केवल पालन में आसान है बल्कि इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफी अधिक होती है. यह देसी नस्ल की तरह खुले वातावरण में भी आसानी से रह सकता है. यह विशेषता आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में इसे और ज्यादा उपयुक्त बनाती है.
जनजातीय क्षेत्रों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है. ऐसे में वनराजा नस्ल का मांस और अंडा प्रोटीन और ऊर्जा से भरपूर होता है, जिससे बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है. इस कारण से सरकार और विभिन्न संस्थाएं भी इसे बढ़ावा देने में रुचि ले रही हैं.