शहडोल के किसान वनराजा मुर्गा से कम लागत में कर रहे हैं शानदार कमाई, आप भी शुरू करें पोल्ट्री फार्म

शहडोल के किसान कम लागत में वनराजा मुर्गे का पालन कर अच्छी कमाई कर रहे हैं. यह नस्ल अंडा और मांस दोनों के लिए उपयोगी है, पालन में आसान है और कुपोषण से लड़ने में भी मददगार साबित हो रही है.

नोएडा | Published: 30 Aug, 2025 | 09:00 AM

मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में देसी तरीके से मुर्गी पालन कर किसान नई आर्थिक राह बना रहे हैं. खासकर वनराजा नस्ल के मुर्गों ने ग्रामीण क्षेत्रों में पोल्ट्री फार्मिंग को नया जीवन दे दिया है. अब किसान इस मुर्गे का पालन कम लागत, कम देखभाल और अधिक उत्पादन के लिए कर रहे हैं. इसका उपयोग अंडा और मांस दोनों के लिए किया जा रहा है, जिससे यह ड्यूल परपज नस्ल के रूप में उभरा है.

कम खर्च, कम झंझट

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वनराजा नस्ल के मुर्गे को बिना किसी विशेष बुनियादी ढांचे के भी पाला जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में घर के पीछे की खुली जगह में इसे बैकयार्ड पोल्ट्री के रूप में पालना बेहद आसान है. इस मुर्गे के लिए न तो महंगे फीड की जरूरत होती है और न ही स्पेशल केयर की. ये मुर्गे कीड़े-मकोड़े, केंचुए, कूड़ा-करकट और बचे-खुचे अनाज से अपना भोजन खुद तलाश कर लेते हैं. इससे किसान का फीड खर्च लगभग खत्म हो जाता है.

तंदुरुस्त, ताकतवर और कुपोषण के खिलाफ हथियार

वनराजा मुर्गा ना केवल पालन में आसान है बल्कि इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफी अधिक होती है. यह देसी नस्ल की तरह खुले वातावरण में भी आसानी से रह सकता है. यह विशेषता आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में इसे और ज्यादा उपयुक्त बनाती है.

जनजातीय क्षेत्रों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है. ऐसे में वनराजा नस्ल का मांस और अंडा प्रोटीन और ऊर्जा से भरपूर होता है, जिससे बच्चों और महिलाओं में पोषण की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है. इस कारण से सरकार और विभिन्न संस्थाएं भी इसे बढ़ावा देने में रुचि ले रही हैं.

जल्दी ग्रोथ, बढ़िया कमाई: एटीएम जैसा मुनाफा

वनराजा मुर्गा एक तेजी से बढ़ने वाली देसी नस्ल है, जो कम लागत और देखरेख में अच्छा मुनाफा देती है. यह नस्ल ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है. सिर्फ 4 हफ्तों में वनराजा मुर्गा 700-800 ग्राम तक वजन पकड़ लेता है और 10 महीने में इसका वजन लगभग 4 किलो तक पहुंच जाता है. वनराजा मुर्गी सालभर में लगभग 120 से 150 हल्के ब्राउन अंडे देती है, जो बाजार में महंगे दामों पर बिकते हैं.

इसकी विशेषता है कि यह खुले वातावरण में भी आसानी से रह सकती है और सामान्य भोजन जैसे कीड़े-मकोड़े, कूड़ा और बचे-खुचे अनाज से भी पोषण ले सकती है. इस कारण इसका पालन बहुत सस्ता पड़ता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने से दवाओं पर भी खर्च कम होता है. इसकी लगातार उत्पादन क्षमता के चलते किसान इसे चलता-फिरता एटीएम कहते हैं. वनराजा नस्ल आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत सहारा बन चुकी है.

Published: 30 Aug, 2025 | 09:00 AM