बरसात में पशुओं की 7 गलतियां पड़ सकती हैं भारी! एक लापरवाही से बिगड़ सकती है सेहत

बारिश में पशुओं को सिर्फ चारे और पानी की जरूरत नहीं, बल्कि अतिरिक्त देखभाल भी चाहिए. गीला चारा, फिसलन भरा फर्श, गंदे थन और जलभराव जैसी छोटी गलतियां पशुओं को बीमार कर सकती हैं. जानिए बरसात में पशुपालकों को किन 7 गलतियों से हर हाल में बचना चाहिए.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 7 Sep, 2026 | 06:00 AM

Monsoon Animal Care Tips: बरसात का मौसम पशुपालकों के लिए राहत के साथ कई चुनौतियां भी लेकर आता है. लगातार बारिश, नमी, कीचड़ और जलभराव के कारण पशुओं में संक्रमण, पाचन संबंधी परेशानी और परजीवी रोगों का खतरा बढ़ जाता है. गीला या फफूंद लगा चारा पशुओं की सेहत के साथ दूध उत्पादन को भी प्रभावित कर सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK Noida) के अनुसार, इस मौसम में पशुओं की साफ-सफाई, संतुलित आहार और पशुशाला की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है.

पशुशाला में नमी और जलभराव न होने दें

बरसात में सबसे पहली सावधानी पशुओं के रहने की जगह  को लेकर बरतनी चाहिए. लगातार गीली जमीन और कीचड़ में खड़े रहने से पशुओं के खुरों में घाव और फुट रॉट जैसी समस्या हो सकती है. वहीं, सीलन वाली जगह पर बैठने से सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. पशुशाला का फर्श ऊंचा, साफ और सूखा रखें. गोबर और बारिश का पानी जमा न होने दें. गाभिन पशुओं के लिए फिसलन विशेष रूप से खतरनाक होती है, इसलिए फर्श पर सूखी रेत डालने के साथ ऐसी सतह रखें, जिस पर खुरों को अच्छी पकड़ मिल सके.

गीला और फफूंद लगा चारा बिल्कुल न खिलाएं

नमी के कारण खली, चोकर, दाने और दूसरे पशु आहार  में फफूंद तेजी से लग सकती है. ऐसा चारा पशुओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है और लंबे समय तक खिलाने पर उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसलिए चारे और दाने को जमीन या दीवार से सटाकर रखने के बजाय लकड़ी के फट्टों या ईंटों के ऊपर सूखी और हवादार जगह पर रखें. बारिश में हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है, लेकिन अचानक बहुत ज्यादा हरा चारा देने से दस्त और पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है. हरे चारे के साथ सूखा चारा या भूसा संतुलित मात्रा में जरूर दें.

ओस वाली घास और परजीवियों से रहें सावधान

सुबह घास पर ओस या बारिश का पानी होने पर पशुओं को तुरंत चरने  के लिए न भेजें. पहले उन्हें थोड़ा सूखा चारा खिलाना बेहतर रहता है. इससे अचानक ज्यादा हरी घास खाने से होने वाली पाचन संबंधी परेशानी और आफरा की आशंका कम हो सकती है. बारिश के बाद नई घास तेजी से उगती है, लेकिन इसके साथ परजीवी और उनके लार्वा भी पशुओं के शरीर में पहुंच सकते हैं. इससे पशु कमजोर होने और दूध उत्पादन घटने की समस्या हो सकती है. पशुपालकों को पशु चिकित्सक की सलाह से समय-समय पर कृमिनाशक दवा और जरूरी टीकाकरण करवाना चाहिए.

थनों की सफाई और बीमार पशु को अलग रखना जरूरी

कीचड़ और गंदगी में बैठने से पशुओं के थनों पर गोबर और मिट्टी चिपक  सकती है. दूध दुहते समय यही गंदगी संक्रमण का कारण बनकर थनैला रोग का खतरा बढ़ा सकती है. इसलिए दूध निकालने से पहले थनों को साफ पानी या उपयुक्त कीटाणुनाशक घोल से साफ कर अच्छी तरह सुखाएं. दूध दुहने वाले व्यक्ति के हाथ और बर्तन भी साफ होने चाहिए. पशुशाला के आसपास पानी जमा न होने दें, क्योंकि जलभराव से मच्छर, मक्खियां और किलनियां बढ़ सकती हैं. किसी पशु में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग बांधें और उसके दाना-पानी के बर्तन भी अलग रखें.

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Published: 7 Sep, 2026 | 06:00 AM

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