अब सब्जी में भी आएगी बासमती की खुशबू, वैज्ञानिकों ने तैयार की खास तोरई

इस अनोखी तोरई को तैयार करने में वैज्ञानिकों को करीब आठ साल का समय लगा है. लगातार शोध, परीक्षण और खेतों में प्रयोग के बाद यह किस्म विकसित की गई है. यह कोई हाइब्रिड या केमिकल से तैयार की गई किस्म नहीं, बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक प्रजाति है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 Jan, 2026 | 02:30 PM

Ridge gourd variety: अब तक आपने बासमती चावल की खुशबू का जिक्र सिर्फ चावल तक ही सुना होगा, लेकिन अब वही खुशबू सब्जी में भी मिलने वाली है. भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिसने सब्जी की दुनिया में नई हलचल मचा दी है. वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने तोरई की एक नई किस्म विकसित की है, जिसमें बासमती चावल जैसी मनमोहक सुगंध आती है. खास बात यह है कि यह खुशबू पकाने या उबालने के बाद भी बनी रहती है.

आठ साल की मेहनत का नतीजा

इस अनोखी तोरई को तैयार करने में वैज्ञानिकों को करीब आठ साल का समय लगा है. लगातार शोध, परीक्षण और खेतों में प्रयोग के बाद यह किस्म विकसित की गई है. यह कोई हाइब्रिड या केमिकल से तैयार की गई किस्म नहीं, बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक प्रजाति है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खोज से न सिर्फ किसानों को फायदा होगा, बल्कि उपभोक्ताओं को भी एक नई तरह की खुशबूदार सब्जी खाने को मिलेगी.

तोरई में कैसे आई बासमती जैसी सुगंध

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार, इस तोरई की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुगंध है. खेत में उगते समय से लेकर रसोई में पकने तक इसकी खुशबू लोगों को आकर्षित करती है. जब इसे पकाया जाता है, तो रसोई में बासमती चावल जैसी खुशबू फैल जाती है. यही वजह है कि बाजार में इसकी मांग सामान्य तोरई से कहीं ज्यादा रहने की उम्मीद है.

हल्के हरे रंग की बेहद आकर्षक तोरई

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस नई किस्म की तोरई का रंग हल्का हरा होता है, जिसे बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पहले से ही काफी पसंद किया जाता है. खासकर यूपी के बस्ती और गोरखपुर मंडल से सटे क्षेत्रों में इस रंग की तोरई की अच्छी मांग रहती है. डॉ. राजेश कुमार के मुताबिक, यह किस्म अपने रंग, खुशबू और स्वाद के कारण अब तक की सबसे अनोखी तोरई मानी जा रही है.

वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

इस किस्म को विकसित करने वाले डॉ. त्रिभुवन चौबे ने बताया कि बासमती खुशबू वाली इस तोरई को नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली में पंजीकृत कराया गया है. इसका नाम वीआरएसजी 7-17 रखा गया है. यह पंजीकरण इस बात का प्रमाण है कि यह किस्म वैज्ञानिक मानकों पर पूरी तरह खरी उतरती है.

किसानों के लिए जल्द उपलब्ध होंगे बीज

संस्थान अब इस किस्म के बीजों को बड़े स्तर पर तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा है. आने वाले समय में किसान इस खुशबूदार तोरई के बीज लेकर अपने खेतों में इसकी खेती कर सकेंगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस किस्म की खेती से किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं, क्योंकि खुशबू और गुणवत्ता के कारण बाजार में इसकी अलग पहचान बनेगी.

कम समय में तैयार होने वाली फसल

यह तोरई 55 से 60 दिनों के भीतर फल देना शुरू कर देती है. इसके फल हल्के हरे रंग के होते हैं और देखने में भी काफी आकर्षक लगते हैं. एक फल की औसत लंबाई करीब 27 सेंटीमीटर, मोटाई लगभग 3.3 सेंटीमीटर और वजन करीब 150 ग्राम के आसपास होता है. एक पौधे से औसतन एक किलो से ज्यादा उत्पादन मिलने की संभावना रहती है, जो किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.

खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां

इस तोरई की खेती खरीफ और रबी, दोनों मौसम में की जा सकती है. अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर बेलों को मचान विधि से सहारा दिया जाए, तो पौधे स्वस्थ रहते हैं, कीटों का प्रकोप कम होता है और पैदावार भी बेहतर मिलती है. खेत की तैयारी के दौरान गोबर की सड़ी खाद या वर्मीकम्पोस्ट मिलाने से पौधों को अच्छा पोषण मिलता है.

सब्जी बाजार में बदल सकती है तस्वीर

विशेषज्ञों का मानना है कि बासमती खुशबू वाली यह तोरई सब्जी बाजार में नई क्रांति ला सकती है. जैसे बासमती चावल अपनी खुशबू के कारण खास पहचान रखता है, वैसे ही यह तोरई भी अपनी सुगंध के चलते अलग मुकाम बना सकती है. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद है और उपभोक्ताओं को स्वाद और खुशबू का नया अनुभव मिलेगा.

किसानों और ग्राहकों दोनों के लिए खुशखबरी

यह नई किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान की बड़ी सफलता मानी जा रही है. एक तरफ किसानों के लिए यह अतिरिक्त आमदनी का रास्ता खोल सकती है, तो दूसरी तरफ ग्राहकों को रोजमर्रा की सब्जी में नया स्वाद और खुशबू मिलने वाली है. आने वाले दिनों में जब यह तोरई खेतों और बाजारों में पहुंचेगी, तब इसका असर साफ तौर पर देखने को मिलेगा.

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