बासमती GI को लेकर बढ़ी खींचतान, 2016 के फैसले पर फिर छिड़ी बहस.. किसानों की उम्मीदें बरकरार

बासमती चावल के GI टैग को लेकर मध्य प्रदेश और पारंपरिक उत्पादक राज्यों के बीच विवाद फिर तेज हो गया है. निर्यातकों ने नए क्षेत्रों को शामिल करने का विरोध किया है, जबकि किसान और राजनीतिक दल अपनी मांग पर कायम हैं. मामला फिलहाल अदालत में लंबित है और सभी की नजर अगले फैसले पर टिकी है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 26 Jun, 2026 | 05:18 PM

Basmati GI Tag: मध्य प्रदेश के बासमती चावल को भौगोलिक संकेत (GI) टैग दिलाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है. इस बीच ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) ने मध्य प्रदेश को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने का खुलकर विरोध किया है. हरियाणा के सोनीपत में हुई एसोसिएशन की आम बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया. इससे पारंपरिक बासमती उत्पादक राज्यों और मध्य प्रदेश के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद और गहरा गया है.

AIREA ने बढ़ाया विरोध, व्यापार जगत भी हुआ सख्त

बिजनेसलाइन के अनुसार, AIREA ने अपने प्रस्ताव में कहा कि फिलहाल बासमती के अधिसूचित GI क्षेत्र का विस्तार नहीं किया जाना चाहिए. ये फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले कुछ निर्यातक मध्य प्रदेश को शामिल करने के पक्ष में थे, लेकिन बैठक में किसी ने भी प्रस्ताव का विरोध नहीं किया. इससे संकेत मिलते हैं कि अब निर्यात उद्योग का बड़ा वर्ग भी GI क्षेत्र के विस्तार के खिलाफ है.

पंजाब और हरियाणा के कई बासमती निर्यातकों  ने सवाल उठाया कि इतने वर्षों बाद अचानक GI क्षेत्र बढ़ाने की मांग क्यों उठाई जा रही है. कुछ निर्यातकों का ये भी कहना था कि जब भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान द्वारा बासमती क्षेत्र बढ़ाने का लगातार विरोध करता रहा है, तो देश के भीतर ऐसा कदम उठाना भारत की दलीलों को कमजोर कर सकता है.

मध्य प्रदेश की पुरानी मांग, राजनीति भी हुई तेज

मध्य प्रदेश में बासमती GI का मुद्दा  लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है. इसकी शुरुआत तब हुई जब वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे और राज्य सरकार ने GI रजिस्ट्री में मध्य प्रदेश को बासमती क्षेत्र में शामिल करने के लिए आवेदन किया था. GI कानून के तहत अधिसूचित क्षेत्र के बाहर उगाई गई बासमती को आधिकारिक तौर पर “बासमती” नाम से बेचा या निर्यात नहीं किया जा सकता. इसी वजह से किसान लंबे समय से GI लाभ की मांग कर रहे हैं. मार्च में दिग्विजय सिंह ने अनशन की चेतावनी दी थी, जबकि अप्रैल में शिवराज सिंह चौहान ने मामला अदालत में लंबित होने का हवाला देकर टिप्पणी से इनकार कर दिया.

APEDA पर बढ़ा फैसला लेने का दबाव

बिजनेसलाइन के अनुसार, मई में दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल  से मिलकर APEDA के पुराने रुख को गलती बताते हुए उसमें सुधार की मांग की. उन्होंने निष्पक्ष समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव भी दिया. इसी सप्ताह वाणिज्य मंत्रालय ने विशेषज्ञों और APEDA अधिकारियों के साथ बैठक की. APEDA चेयरमैन अभिषेक देव ने भी कानूनी विशेषज्ञों से चर्चा की. केदार सिरोही ने कहा कि मध्य प्रदेश को GI क्षेत्र में शामिल करने पर अंतिम फैसला APEDA को ही करना होगा और उसे किसी एक राज्य का पक्ष नहीं लेना चाहिए.

मामला अब भी मद्रास हाईकोर्ट में लंबित

विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत यूरोपीय संघ जैसे वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान ने बासमती क्षेत्र बढ़ाने का विरोध कर रहा है, तब देश के भीतर ऐसा विस्तार उचित नहीं होगा. उनका मानना है कि अदालत के अंतिम फैसले तक यथास्थिति बनी रहनी चाहिए. फरवरी 2016 में चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री ने APEDA को बासमती का GI प्रमाणपत्र दिया था, जिसमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली के कुछ जिले शामिल थे. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मामला मद्रास हाईकोर्ट भेजा, जहां यह लंबित है. 16 जून को लॉ फर्म की नियुक्ति पर भी पुनर्विचार की मांग उठी, जबकि APEDA ने प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बताया.

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Published: 26 Jun, 2026 | 04:17 PM

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