Agriculture News: देश में किसानों पर कृषि लोन बढ़ता जा रहा है. लेकिन सबसे ज्यादा कृषि लोन वहां के किसानों के ऊपर है, जहां बहुत कम रकबे में खेती होती है. इसका खुलासा राज्यसभा में पेश किए गए ताजे आंकड़ों से हुआ है. आंकड़ों के अनुसार, देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किसानों पर कर्ज का बोझ बहुत असमान है. इस सूची में चंडीगढ़ एक चौंकाने वाला उदाहरण बनकर सामने आया है. यहां खेती की जमीन लगभग न के बराबर होने के बावजूद प्रति किसान कृषि ऋण देश में सबसे ज्यादा है. चंडीगढ़ में करीब 8,000 कृषि ऋण खातों पर कुल 3,068 करोड़ रुपये का कर्ज है. यानी औसतन एक खाते पर लगभग 38.35 लाख रुपये का लोन बनता है, जो पूरे देश में सबसे अधिक है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह किसानों की बदहाली नहीं, बल्कि शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में कृषि ऋण व्यवस्था की एक बड़ी खामी को दिखाता है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल, चंडीगढ़ और उसके आसपास कृषि भूमि की कीमतें करोड़ों रुपये प्रति एकड़ तक हैं. इतनी महंगी जमीन गिरवी रखकर बड़े लोन आसानी से मिल जाते हैं, जिनका इस्तेमाल कई बार वास्तविक खेती के बजाय रियल एस्टेट, कारोबार बढ़ाने या निवेश में किया जाता है. कम ब्याज, सब्सिडी और कर्ज माफी जैसी सुविधाओं वाले कृषि ऋणों के दुरुपयोग पर अर्थशास्त्री और ऑडिटर पहले भी सवाल उठा चुके हैं.
दिल्ली में 4.14 लाख खातों पर 26,998 करोड़ रुपये का कर्ज
यह समस्या इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि चंडीगढ़ में कृषि ऋण खातों की संख्या बहुत कम है. ऐसे में कुछ बड़े लोन ही औसत आंकड़ों को बेहद ऊंचा दिखा देते हैं. वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने 16 दिसंबर को राज्यसभा में सांसद मुकुल बालकृष्ण वासनिक के सवाल के जवाब में यह जानकारी दी. आंकड़ों के अनुसार, प्रति खाते कृषि ऋण के मामले में दिल्ली दूसरे नंबर पर है. दिल्ली में 4.14 लाख खातों पर 26,998 करोड़ रुपये का कर्ज है, यानी औसतन 6.52 लाख रुपये प्रति किसान. यहां भी सीमित खेती के बावजूद इतने बड़े कृषि ऋणों के इस्तेमाल पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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पंजाब में कृषि ऋण खातों पर 97,471 करोड़ रुपये का कर्ज
वहीं, प्रमुख कृषि राज्य पंजाब के आंकड़े किसानों की बढ़ती परेशानी को दिखाते हैं. पंजाब में 25.23 लाख कृषि ऋण खातों पर 97,471 करोड़ रुपये का कर्ज है. इससे प्रति किसान औसतन 3.86 लाख रुपये का कर्ज बनता है और यह राज्य देश में चौथे स्थान पर है. संगरूर के अधिवक्ता कमल आनंद, जिन्होंने इन आंकड़ों का विश्लेषण किया है, कहते हैं कि शहरी और कृषि क्षेत्रों के बीच फर्क बेहद चौंकाने वाला है. उनके मुताबिक, चंडीगढ़ में जहां खेती की जमीन लगभग नहीं है, वहां प्रति कृषि ऋण 38.35 लाख रुपये होना समझ से परे है. यही स्थिति दिल्ली की भी है. ऐसा लगता है कि कम ब्याज वाले कृषि ऋणों का इस्तेमाल खेती के अलावा दूसरे कामों में किया जा रहा है, जिसकी गहराई से जांच होनी चाहिए.
हरियाणा पर कुल 1,00,013 करोड़ रुपये का कर्ज
तुलनात्मक रूप से पड़ोसी राज्य हरियाणा में 36.63 लाख कृषि ऋण खाते हैं, जिन पर कुल 1,00,013 करोड़ रुपये का कर्ज है. यहां प्रति खाते औसतन 2.73 लाख रुपये का कर्ज बनता है, जो पंजाब से 1.13 लाख रुपये कम है. कमल आनंद का कहना है कि यह अंतर दिखाता है कि पंजाब किसानों को टिकाऊ खेती और दीर्घकालीन नीतियों के जरिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पा रहा है. उन्होंने कर्ज से जुड़ी बढ़ती किसान आत्महत्याओं पर भी चिंता जताई. दूसरी ओर, मेघालय में देश में सबसे कम औसत कृषि ऋण दर्ज किया गया है. यहां 1.45 लाख खातों पर कुल 1,116 करोड़ रुपये का कर्ज है.