‘फॉल आर्मीवॉर्म’ से मक्का को भारी नुकसान, 1.70 लाख हेक्टेयर फसल हो सकती है प्रभावित, जानें बचाव के उपाय

फॉल आर्मीवॉर्म (FAW), जिसे वैज्ञानिक भाषा में Spodoptera frugiperda कहा जाता है, मक्का की फसल को भारी नुकसान पहुंचाने वाला कीट है. इसकी सूंडियां (लार्वा) मक्के की पत्तियों, फूलों (टैसल्स) और भुट्टों को खा जाती हैं, जिससे उपज में भारी गिरावट आती है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 27 Jul, 2025 | 08:38 AM

Fall Armyworm: हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में फॉल आर्मीवॉर्म (FAW) की भारी संख्या में मौजूदगी दर्ज की गई है, जिससे मक्के की फसल को बड़ा खतरा पैदा हो गया है और किसानों में चिंता बढ़ गई है. कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, उत्तर जोन के कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी, ऊना और चंबा जिले में FAW का काफी बड़े स्तर पर संक्रमण देखा गया है. इस जोन में लगभग 1.70 लाख हेक्टेयर में मक्के की बुवाई की गई है. 22 जुलाई तक ऊना जिले में फॉल आर्मीवॉर्म का संक्रमण करीब 15 फीसदी पाया गया है. हमीरपुर में 10-12 फीसदी, कांगड़ा के निचले हिस्सों में 12 फीसदी, चंबा में 10 फीसदी और मंडी जिले की कुछ जगहों पर 8 से10 फीसदी संक्रमण की सूचना मिली है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फॉल आर्मीवॉर्म (FAW), जिसे वैज्ञानिक भाषा में Spodoptera frugiperda कहा जाता है, मक्का की फसल को भारी नुकसान पहुंचाने वाला कीट है. इसकी सूंडियां (लार्वा) मक्के की पत्तियों, फूलों (टैसल्स) और भुट्टों को खा जाती हैं, जिससे उपज में भारी गिरावट आती है. ये कीट पौधे के तनों के अंदर तक घुस जाते हैं और अंदर से खोखला कर देते हैं, जिससे पौधा पूरी तरह बर्बाद हो जाता है. भारत में FAW पहली बार 2018 में कर्नाटक में पाया गया था और हिमाचल में वैज्ञानिकों ने इसे 2019 में देखा था.

मंत्री ने की उच्चस्तरीय बैठक

इस खतरे को देखते हुए मंगलवार को कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की. बैठक में कृषि विभाग के उत्तर जोन के अतिरिक्त निदेशक डॉ. राहुल कटोच, पालमपुर स्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय (CSKHPKV) के कुलपति डॉ. नवीन कुमार, एटीएमए और JICA प्रोजेक्ट्स के अधिकारी और वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए.

रोकथाम के उपायों को बढ़ावा देना जरूरी है

बैठक के दौरान कृषि मंत्री ने कहा कि फसल की शुरुआती अवस्था में ही प्राकृतिक खेती पर आधारित रोकथाम के उपायों को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम हो सके. विभागीय अधिकारियों ने जमीनी स्तर पर लगातार और सख्त निगरानी रखने पर ज़ोर दिया, ताकि समय पर कीट की पहचान और नियंत्रण किया जा सके. कृषि मंत्री ने कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को निर्देश दिए कि वे पड़ोसी राज्यों जैसे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) लुधियाना जैसे संस्थानों के साथ मिलकर काम करें और इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिए अनुभव और जानकारी का आदान-प्रदान करें.

इस तरह करें फसल का इलाज

उत्तर जोन के अतिरिक्त कृषि निदेशक डॉ. राहुल कटोच ने कहा कि किसानों को अपने खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए. अगर कीट प्रकोप 10 फीसदी से कम है, तो रासायनिक दवाओं की जरूरत नहीं है. ऐसी स्थिति में नीम से बने अर्क या प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाले अन्य जैविक विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है. बायो-पेस्टीसाइड्स भी असरदार हो सकते हैं. लेकिन अगर संक्रमण 10 फीसदी से ज्यादा हो जाए, तो क्लोरांट्रानिलिप्रोल या एमामेक्टिन बेंजोएट (4 मिली प्रति 10 लीटर पानी) जैसे रासायनिक स्प्रे का इस्तेमाल करना चाहिए.

बुवाई से पहले करें गहरी जुताई

अगली बुवाई के मौसम के लिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे गहरी जुताई करें और कुछ समय तक मिट्टी को धूप में छोड़ें. इसके साथ ही उन्हें खेत की साफ-सफाई, खरपतवार नियंत्रण और काउपी या नेपियर घास जैसे अवरोधक फसलों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है. दालों के साथ मिश्रित खेती (इंटरक्रॉपिंग) भी फायदेमंद होगी.

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Published: 27 Jul, 2025 | 08:25 AM

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