नीलगाय का आतंक होगा खत्म…फरवरी में लगाएं ये फसल, किसानों की होगी भर-भर के कमाई

पिपरमेंट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे नीलगाय नहीं खाती और बाजार में इसकी मांग साल भर बनी रहती है. फरवरी में लगाई गई इस फसल से किसान एक एकड़ में सभी खर्च निकालने के बाद 80 से 90 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 4 Feb, 2026 | 10:01 AM

ग्रामीण इलाकों में खेती करने वाले किसानों के लिए नीलगाय आज सबसे बड़ी परेशानी बन चुकी है. कई जगह तो हालात ऐसे हैं कि किसान मेहनत से फसल लगाते हैं, लेकिन कटाई से पहले ही नीलगाय खेत उजाड़ देती है. रातों-रात खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है और किसान बेबस होकर नुकसान देखता रह जाता है. यही वजह है कि अब किसान ऐसी फसलों की तलाश में हैं, जो नीलगाय से सुरक्षित रहें और कमाई भी अच्छी दें. ऐसी ही एक फसल है, जो न सिर्फ नीलगाय को पसंद नहीं आतीं, बल्कि किसानों के लिए फायदे का सौदा भी साबित हो रही हैं.

नीलगाय क्यों नहीं खाती ये फसलें

कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों का कहना है कि नीलगाय तेज खुशबू और तीखे स्वाद वाली फसलों से दूरी बनाकर रखती है. ऐसी फसलों में पिपरमेंट, लेमनग्रास और तुलसी प्रमुख हैं. इन पौधों की गंध इतनी तेज होती है कि नीलगाय खेत में घुसने से पहले ही मुड़ जाती है. यही कारण है कि जिन खेतों में ये फसलें लगी होती हैं, वहां नीलगाय का नुकसान बहुत कम या लगभग ना के बराबर होता है.

फरवरी में क्यों करें पिपरमेंट की खेती

पिपरमेंट की खेती के लिए फरवरी का महीना बेहद उपयुक्त माना जाता है. इस समय मौसम न ज्यादा ठंडा होता है और न ही ज्यादा गर्म, जिससे पौधे जल्दी जम जाते हैं. किसान फरवरी के पहले पखवाड़े से लेकर मार्च की शुरुआत तक इसकी रोपाई आसानी से कर सकते हैं.

खेत की तैयारी कैसे करें

पिपरमेंट की अच्छी फसल के लिए खेत की सही तैयारी बहुत जरूरी होती है. फरवरी के महीने में जब ठंड कम होने लगती है, तब खेत की 2 से 3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए. इससे मिट्टी नरम और भुरभुरी हो जाती है. जुताई के बाद खेत को समतल करें और अगर संभव हो तो सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिला दें. इससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और पत्तियों में तेल की मात्रा भी बढ़ती है.

रोपाई का सही समय और तरीका

पिपरमेंट की खेती बीज से नहीं की जाती. इसकी रोपाई जड़ों या तनों के छोटे-छोटे टुकड़ों से की जाती है. फरवरी का महीना इसकी रोपाई के लिए सबसे अच्छा माना जाता है. किसान फरवरी के पहले से दूसरे पखवाड़े तक इसकी रोपाई कर सकते हैं. खेत में क्यारियां या बेड बनाकर 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई में इन टुकड़ों को लगाया जाता है. रोपाई के बाद हल्की सिंचाई जरूर करनी चाहिए, ताकि पौधे जल्दी जम जाएं.

सिंचाई और देखभाल

पिपरमेंट को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन खेत में नमी बनी रहनी चाहिए. रोपाई के बाद शुरुआत में हल्की सिंचाई करें और बाद में 8 से 10 दिन के अंतर पर पानी देते रहें. खेत में उगने वाली खरपतवार को समय-समय पर निकालते रहना जरूरी है, ताकि पौधों को पूरा पोषण मिल सके. साफ खेत में पौधे तेजी से फैलते हैं.

खाद और पोषण का ध्यान

अगर किसान जैविक खेती करते हैं तो तरल जैविक खाद या गोमूत्र आधारित खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और तेल की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है. लगभग 25 से 30 दिन बाद जब पौधे फैलने लगें, तब हल्की मात्रा में खाद देने से फसल को फायदा मिलता है.

फसल कब होती है तैयार

पिपरमेंट की फसल करीब 85 से 90 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. जब पौधों की पत्तियों से तेज खुशबू आने लगे और खेत पूरी तरह हरा दिखने लगे, तब कटाई का सही समय होता है. सही समय पर कटाई करने से तेल की मात्रा और गुणवत्ता दोनों अच्छी रहती हैं.

तेल निकालने की प्रक्रिया

कटाई के बाद पत्तियों और तनों से तेल निकाला जाता है. इसके लिए डिस्टिलेशन यूनिट या प्लांट का इस्तेमाल किया जाता है. आजकल कई जिलों में तेल निकालने की सुविधा उपलब्ध है. निकला हुआ पिपरमेंट ऑयल साफ करके बाजार में बेचा जाता है, जहां इसकी अच्छी कीमत मिलती है.

मुनाफा क्यों है ज्यादा

पिपरमेंट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे नीलगाय नहीं खाती और बाजार में इसकी मांग साल भर बनी रहती है. फरवरी में लगाई गई इस फसल से किसान एक एकड़ में सभी खर्च निकालने के बाद 80 से 90 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं.

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