Ganga river fish: कभी प्रदूषण, अवैध शिकार और लगातार मानवीय दबाव के कारण गंगा नदी की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई जाती थी. ऐसा लगने लगा था कि गंगा धीरे-धीरे अपनी जैव विविधता खोती जा रही है. लेकिन अब गंगा की गोद से एक अच्छी खबर सामने आई है. हालिया अध्ययन में गंगा नदी में मछलियों की संख्या और प्रजातियों में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसे पिछले 50 वर्षों में सबसे बेहतर स्थिति माना जा रहा है. यह बदलाव न सिर्फ पर्यावरण के लिए राहत भरा है, बल्कि गंगा पर निर्भर लाखों लोगों के लिए भी उम्मीद का संकेत है.
50 साल में सबसे ज्यादा मछली प्रजातियां
ICAR-CIFRI द्वारा किए गए ताजा सर्वे में गंगा नदी के अलग-अलग हिस्सों में कुल 230 मछली प्रजातियां दर्ज की गई हैं. यह संख्या बीते पांच दशकों में सबसे अधिक है. इतिहास पर नजर डालें तो 1822 में पहली बार हुए सर्वे में गंगा में 271 प्रजातियां पाई गई थीं. इसके बाद समय के साथ हालात बिगड़ते गए. 1974 में यह संख्या घटकर 207 रह गई, 1991 में 172 और 1998 तक आते-आते केवल 110 प्रजातियां ही बची थीं. यह दौर गंगा के लिए सबसे कठिन माना जाता है.
संरक्षण प्रयासों से बदली तस्वीर
गंगा की बिगड़ती हालत को देखते हुए वैज्ञानिकों और सरकार ने मिलकर संरक्षण और पुनर्जीवन के प्रयास तेज किए. वर्ष 2004 में इन कोशिशों का असर दिखने लगा और मछलियों की संख्या बढ़कर 162 तक पहुंची. हालांकि 2012 में इसमें फिर थोड़ी गिरावट आई, लेकिन इसके बाद लगातार किए गए प्रयासों ने गंगा को संभाल लिया. वर्ष 2023 में हुए अध्ययन में 230 प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि गंगा अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही है.
किन इलाकों में सबसे ज्यादा सुधार
अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश के बिजनौर और नरौरा क्षेत्र में मछलियों की सबसे ज्यादा प्रजातियां दर्ज की गईं. पश्चिम बंगाल में फरक्का, बहारमपुर, फ्रेजरगंज, बलागरह और त्रिवेणी जैसे इलाकों में भी मछली विविधता में साफ सुधार देखा गया. हालांकि डायमंड हार्बर और गडखाली जैसे क्षेत्रों में अब भी प्रजातियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कुछ हिस्सों में और प्रयास जरूरी हैं.
मछली पालन से मिली नई ताकत
गंगा में मछलियों की संख्या बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर रोहू, कतला, मृगल और महसीर जैसी प्रमुख प्रजातियों के करोड़ों फिंगरलिंग्स नदी में छोड़े गए. इसके अलावा हिलसा मछली के संरक्षण पर भी खास ध्यान दिया गया. फरक्का बैराज के ऊपर हिलसा को छोड़े जाने से यह मछली अब पहले की तुलना में ज्यादा ऊपर तक पहुंचने लगी है. इससे यह साफ है कि गंगा का प्राकृतिक संतुलन धीरे-धीरे लौट रहा है.
मछुआरों और पर्यावरण दोनों के लिए राहत
मछलियों की बढ़ती संख्या से गंगा पर निर्भर मछुआरों की आजीविका में सुधार की उम्मीद जगी है. साथ ही यह संकेत भी मिलता है कि यदि संरक्षण और निगरानी इसी तरह जारी रही, तो गंगा न सिर्फ आस्था की नदी बनी रहेगी, बल्कि जैव विविधता से भरपूर एक जीवंत नदी के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत करेगी.