किसान अक्सर ऐसी सब्जी की तलाश में रहते हैं, जो कम समय में तैयार हो जाए, खर्च भी ज्यादा न आए और बाजार में दाम अच्छे मिलें. जनवरी का महीना इस लिहाज से खास होता है, क्योंकि सर्दी धीरे-धीरे कम होने लगती है और खेत खाली भी रहते हैं. ऐसे में देसी टिंडा एक बेहतरीन विकल्प बनकर सामने आता है. यह सब्जी न सिर्फ जल्दी तैयार होती है, बल्कि सही समय पर बोने पर इसका बाजार भाव इतना अच्छा मिल जाता है कि मुनाफा देखकर आसपास के किसान भी हैरान रह जाते हैं.
जनवरी में देसी टिंडा की खेती क्यों है फायदेमंद
देसी टिंडा की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम अवधि है. जनवरी के पहले पखवाड़े में बोई गई फसल करीब 45 से 50 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. इस समय मंडियों में इसकी आवक कम रहती है, इसलिए भाव अच्छे मिलते हैं. कई जगहों पर शुरुआती तुड़ाई में टिंडा 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है. बाद में भी दाम 30 से 40 रुपये किलो के आसपास बने रहते हैं, जो किसानों के लिए फायदे का सौदा है. एक और अच्छी बात यह है कि जैसे-जैसे फरवरी-मार्च में तापमान बढ़ता है, टिंडा की बढ़वार और तेज हो जाती है और फसल पर ठंड का असर भी नहीं पड़ता.
देसी टिंडा की सही किस्म का चुनाव
अच्छी पैदावार और बेहतर दाम के लिए सही किस्म का चयन बहुत जरूरी होता है. देसी टिंडा की कुछ किस्में ऐसी हैं, जो कम तापमान में भी अच्छा अंकुरण करती हैं और फल एकसार आते हैं. बाजार में मांग को देखते हुए नरेश टिंडा, नामधारी टिंडा और भठिंडा जैसी किस्में किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. ये किस्में न सिर्फ उत्पादन में अच्छी हैं, बल्कि इनका आकार और रंग भी मंडी में पसंद किया जाता है.
खेत की तैयारी और बुवाई का सही तरीका
देसी टिंडा की खेती के लिए खेत की मिट्टी भुरभुरी और जल निकास वाली होनी चाहिए. खेत की पहली जुताई के बाद सड़ी हुई गोबर की खाद डालना फायदेमंद रहता है, जिससे मिट्टी में नमी और पोषक तत्व बने रहते हैं. इसके बाद दो-तीन जुताई कर खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें.
जनवरी में ठंड के कारण बीज अंकुरण थोड़ा धीमा हो सकता है, इसलिए बीज बोने से पहले उन्हें 12 से 24 घंटे तक गुनगुने पानी में भिगोना अच्छा रहता है. इससे बीज जल्दी और एकसार उगते हैं. बुवाई के समय 5 फीट की दूरी पर बेड बनाएं और पौधे से पौधे की दूरी करीब 1 फीट रखें, ताकि बेलों को फैलने की पर्याप्त जगह मिल सके.
सिंचाई और खाद प्रबंधन
बुवाई के बाद पहली सिंचाई बहुत हल्की रखें और तब करें जब अधिकांश बीज अंकुरित हो जाएं. इसके 2-3 दिन बाद दूसरी सिंचाई करें. टिंडा की फसल में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन नमी बनी रहनी चाहिए. अगर रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहें तो डीएपी, यूरिया और पोटाश का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें. सही समय पर खाद देने से फलन अच्छा होता है और तुड़ाई का समय भी बढ़ जाता है.
रोग-कीट और खरपतवार से बचाव
देसी टिंडा में रोग और कीट का प्रकोप आमतौर पर कम होता है, यही वजह है कि इसमें खर्च भी कम आता है. फिर भी खेत को खरपतवार से साफ रखना जरूरी है. कई किसान प्लास्टिक मल्च का इस्तेमाल करते हैं, जिससे न सिर्फ खरपतवार कम होते हैं बल्कि नमी भी लंबे समय तक बनी रहती है और उत्पादन बढ़ता है.
कमाई का हिसाब
अगर एक एकड़ में सही तरीके से टिंडा की खेती की जाए, तो 80 से 100 क्विंटल तक उत्पादन आसानी से मिल सकता है. शुरुआती दाम अगर 50 रुपये किलो भी मिल जाएं, तो आमदनी का अंदाजा लगाया जा सकता है. लागत कम होने के कारण शुद्ध मुनाफा काफी अच्छा निकलता है.