सफेद मक्खी ने तोड़ी नारियल किसानों की कमर, फसल और आमदनी दोनों पर गहराया संकट

जलवायु परिवर्तन के कारण जब धान, गन्ना और केला जैसी फसलें जोखिम भरी होने लगीं, तब कई किसानों ने नारियल को सुरक्षित विकल्प माना. नारियल कम पानी में भी चल जाता है और लंबे समय तक आमदनी देता है. इसी वजह से पिछले दो दशकों में नारियल का रकबा और उत्पादन तेजी से बढ़ा. लेकिन 2016 के बाद हालात बदलने लगे.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 22 Jan, 2026 | 03:21 PM

Coconut whitefly crisis: भारत के दक्षिणी राज्यों में नारियल सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका है. केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में नारियल के बागान गांवों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं. लेकिन बीते करीब दस वर्षों से एक छोटा सा कीट इस पूरी व्यवस्था को हिला रहा है. इस कीट का नाम है रुगोज स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई, जिसे आम भाषा में सफेद मक्खी कहा जाता है. दिखने में मामूली लगने वाला यह कीट आज नारियल किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है.

कैसे फैलता है सफेद मक्खी का असर

सफेद मक्खी नारियल, केला, पाम और दूसरी कई फसलों की पत्तियों का रस चूसती है. यह पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ती है, जिस पर बाद में काली फफूंद जम जाती है. इससे पत्तियां काली पड़ जाती हैं और पौधे का भोजन बनाने का प्राकृतिक तरीका यानी प्रकाश संश्लेषण बाधित हो जाता है. धीरे-धीरे पेड़ कमजोर होने लगता है और उत्पादन तेजी से गिर जाता है. किसानों का कहना है कि एक बार अगर सफेद मक्खी का हमला तेज हो जाए, तो सालों तक उसका असर बना रहता है.

नारियल की खेती क्यों हुई ज्यादा प्रभावित

जलवायु परिवर्तन के कारण जब धान, गन्ना और केला जैसी फसलें जोखिम भरी होने लगीं, तब कई किसानों ने नारियल को सुरक्षित विकल्प माना. नारियल कम पानी में भी चल जाता है और लंबे समय तक आमदनी देता है. इसी वजह से पिछले दो दशकों में नारियल का रकबा और उत्पादन तेजी से बढ़ा. लेकिन 2016 के बाद हालात बदलने लगे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नारियल उत्पादन में गिरावट आई है और उत्पादकता भी पहले जैसी नहीं रही. किसान मानते हैं कि सफेद मक्खी इस गिरावट की बड़ी वजह है.

किसानों की जमीनी हकीकत

तमिलनाडु और केरल के कई इलाकों में किसान बताते हैं कि पहले एक पेड़ से 200 से 300 नारियल तक मिल जाते थे. अब यही संख्या घटकर आधी या उससे भी कम रह गई है. नारियल का आकार, स्वाद और पानी की मात्रा भी प्रभावित हो रही है. टेंडर नारियल बेचने वाले किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ रहा है, क्योंकि ग्राहक काले धब्बों वाले या कमजोर दिखने वाले नारियल लेने से बचते हैं.

सलाह मिली, लेकिन समाधान नहीं

सफेद मक्खी से निपटने के लिए किसानों को कई तरह की सलाह दी गई. कहीं पीले चिपचिपे ट्रैप लगाने को कहा गया, कहीं नीम का छिड़काव और कहीं पानी की तेज धार से पत्तियां धोने की बात हुई. कुछ जगहों पर जैविक नियंत्रण के तहत परजीवी कीट छोड़ने के प्रयोग भी किए गए. लेकिन किसानों का अनुभव है कि ये उपाय कागजों और प्रयोगशालाओं में तो अच्छे लगते हैं, खेतों में इनका असर बहुत सीमित रहा.

बढ़ती लागत और घटती आमदनी

उत्पादन घटने के साथ-साथ किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है. पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें अतिरिक्त खाद, सूक्ष्म पोषक तत्व और जैविक खाद डालनी पड़ रही है. कई किसान कर्ज के सहारे खेती चला रहे हैं. निराशा की स्थिति यह है कि कुछ लोग जानलेवा और प्रतिबंधित रसायनों का सहारा लेने लगे हैं, क्योंकि उन्हें कोई कारगर विकल्प नजर नहीं आता. यह न केवल किसानों के स्वास्थ्य, बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है.

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता तापमान और मौसम का असंतुलन सफेद मक्खी के लिए अनुकूल माहौल बना रहा है. गर्मी में यह कीट तेजी से बढ़ता है और मानसून के बाद थोड़ी राहत जरूर मिलती है, लेकिन गर्मी लौटते ही समस्या फिर गंभीर हो जाती है. घनी नारियल बागवानी वाले इलाकों में इसका नियंत्रण और मुश्किल हो जाता है.

समन्वित प्रयासों की कमी

विशेषज्ञों के अनुसार सफेद मक्खी पर काबू पाने के लिए पूरे इलाके में एक साथ प्रयास जरूरी हैं. अगर कुछ किसान उपाय अपनाएं और कुछ नहीं, तो कीट दोबारा लौट आता है. भारत जैसे देश में हजारों छोटे किसानों के बीच ऐसा तालमेल बनाना आसान नहीं है. यही वजह है कि पिछले एक दशक में भी स्थायी समाधान नहीं निकल पाया.

खुद संकट में नारियल

किसान और जानकार मानते हैं कि अब इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर देखने की जरूरत है. समय रहते कीटों की पहचान, जिला स्तर पर निगरानी, भरोसेमंद जैविक उपायों की बड़े पैमाने पर उपलब्धता और नकली दवाओं पर सख्त नियंत्रण बेहद जरूरी है. इसके साथ ही जलवायु के अनुसार कीट प्रबंधन की रणनीति बनानी होगी.

नारियल जैसी फसल, जिसे कभी सूखे में सहारा माना गया था, आज खुद संकट में है. अगर सफेद मक्खी पर जल्द और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह सिर्फ एक कीट की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका पर सीधा असर डालने वाला बड़ा कृषि संकट बन जाएगी.

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