नए साल की शुरुआत के साथ ही देश के जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ने लगी है. भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के 166 बड़े जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का करीब 75 प्रतिशत ही पानी बचा है. यह स्थिति इसलिए भी अहम है क्योंकि साल के शुरुआती महीनों में ही बारिश न के बराबर हुई है और आगे भी मानसून आने में अभी काफी समय बाकी है. पानी का यह स्तर खेती, पीने के पानी और बिजली उत्पादन तीनों के लिए बेहद अहम माना जाता है.
कुल भंडारण कितना और तुलना क्या कहती है
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, इस समय इन जलाशयों में करीब 138.8 अरब घन मीटर पानी मौजूद है, जबकि इनकी कुल क्षमता 183.5 अरब घन मीटर से ज्यादा है. राहत की बात यह है कि यह स्तर पिछले साल की तुलना में थोड़ा बेहतर है और बीते 10 वर्षों के औसत से भी काफी ऊपर है. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि हाल के हफ्तों में जल स्तर तेजी से गिरा है, खासकर दक्षिण भारत में, जहां हालात ज्यादा गंभीर होते दिख रहे हैं.
दक्षिण भारत में ज्यादा असर, मानसून बना वजह
दक्षिणी राज्यों की जल व्यवस्था काफी हद तक उत्तर-पूर्व मानसून पर निर्भर रहती है, जो आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय रहता है. साल 2025 में यह मानसून कमजोर रहा और दिसंबर में बारिश व्यापक रूप से नहीं हो पाई. इसका सीधा असर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना के जलाशयों पर पड़ा. दक्षिण भारत के 47 बड़े जलाशयों में इस समय औसतन 70 प्रतिशत के आसपास ही पानी बचा है, जो पिछले साल के मुकाबले कम है. हालांकि आंध्र प्रदेश इस मामले में अपवाद बना हुआ है, जहां जलाशयों में भंडारण अपेक्षाकृत बेहतर बताया जा रहा है.
राज्यवार स्थिति: कहीं राहत, कहीं परेशानी
आंध्र प्रदेश के बांधों में करीब 84 प्रतिशत तक पानी भरा हुआ है, जबकि तमिलनाडु में यह स्तर 76 प्रतिशत के आसपास है. केरल में जलाशय 70 प्रतिशत तक भरे हैं, लेकिन कर्नाटक और तेलंगाना में हालात थोड़े कमजोर हैं, जहां भंडारण क्रमशः 64 और 67 प्रतिशत बताया गया है. इससे साफ है कि दक्षिण के कुछ हिस्सों में गर्मियों से पहले ही पानी की तंगी महसूस की जा सकती है.
बारिश की कमी ने बढ़ाई मुश्किल
भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं. जनवरी की शुरुआत से अब तक देश के करीब 80 प्रतिशत जिलों में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई है. इसके अलावा करीब 12 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है. बारिश की यह कमी जलाशयों में नए पानी की आवक को रोक रही है, जबकि रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी की निकासी लगातार जारी है.
पूर्व, मध्य और पश्चिम भारत की स्थिति
पूर्वी भारत की बात करें तो असम, झारखंड, मिजोरम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में जलाशयों का स्तर पिछले साल से नीचे चला गया है. असम के कुछ जलाशयों में तो स्थिति काफी कमजोर मानी जा रही है. वहीं ओडिशा और त्रिपुरा में हालात थोड़े बेहतर हैं.
मध्य भारत में तस्वीर तुलनात्मक रूप से संतुलित नजर आती है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जलाशयों का स्तर ठीक-ठाक है, जबकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भंडारण मध्यम स्तर पर बना हुआ है.
पश्चिमी भारत फिलहाल सबसे बेहतर स्थिति में है. महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा के जलाशयों में औसतन 85 प्रतिशत तक पानी मौजूद है, जो अन्य क्षेत्रों की तुलना में राहत की बात है.
कुछ बांध पूरी तरह भरे, लेकिन खतरा बरकरार
फिलहाल देश के 6 बड़े जलाशय पूरी तरह भरे हुए हैं और 37 जलाशयों में 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी मौजूद है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति ज्यादा समय तक बनी रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं है. मौसम विभाग का अनुमान है कि मई तक बारिश सामान्य से कम रह सकती है. अगर ऐसा हुआ तो आने वाले हफ्तों में जलाशयों का स्तर और गिर सकता है.
क्या हो सकता है असर
जलाशयों में घटता पानी सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है, इसका असर सीधे आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है. खेती के लिए सिंचाई, शहरों में पीने का पानी और जलविद्युत उत्पादन—तीनों पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में पानी के समझदारी से इस्तेमाल और जल संरक्षण पर ध्यान देना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है.