Green Hydrogen: भारत ने वर्ष 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) की शुरुआत बड़े लक्ष्य के साथ की थी. इसका उद्देश्य केवल स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और देश को कम-कार्बन अर्थव्यवस्था में अग्रणी बनाना भी था. मिशन के तहत वर्ष 2030 तक हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था. हालांकि अब शुरुआती उत्साह के बाद कई चुनौतियां सामने आ रही हैं.
लक्ष्य हासिल करने में हो सकती है देरी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्ष 2030 तक 50 लाख टन के बजाय करीब 30 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन तक ही पहुंच सकता है. ऐसे में मूल लक्ष्य वर्ष 2032 तक खिसक सकता है. फरवरी 2026 तक देश में केवल 8,000 टन प्रतिवर्ष की ग्रीन हाइड्रोजन क्षमता ही शुरू हो पाई है. इससे साफ है कि मिशन की रफ्तार अभी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है. हालांकि सरकार की ओर से इस क्षेत्र में निवेश लगातार बढ़ाया जा रहा है. मिशन के लिए धन का उपयोग भी बढ़ा है, लेकिन इसकी गति अभी भी लक्ष्य के मुकाबले काफी कम मानी जा रही है.
केवल उत्पादन नहीं, तकनीकी क्षमता भी जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उत्पादन लक्ष्य हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होगा. यदि ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए जरूरी मशीनें, उपकरण और तकनीक विदेशों से आयात करनी पड़ें, तो ऊर्जा सुरक्षा का उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं हो पाएगा. इसी वजह से अब मिशन के अगले चरण में घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान और तकनीकी विकास पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बताई जा रही है. इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, इंजीनियरिंग क्षमता और नई तकनीकों के विकास में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है.
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उर्वरक क्षेत्र बन सकता है सबसे बड़ा आधार
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन की मांग बढ़ाने में उर्वरक उद्योग अहम भूमिका निभा सकता है. भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ताओं में शामिल है और बड़ी मात्रा में कच्चे माल का आयात करता है. यदि ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग उर्वरक उत्पादन में बढ़ाया जाए, तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है. इससे देश की खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा दोनों को मजबूती मिलेगी. साथ ही किसानों को भी लंबे समय में स्थिर आपूर्ति का लाभ मिल सकता है.
आत्मनिर्भरता पर रहेगा अगले चरण का फोकस
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की सफलता केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं मापी जानी चाहिए. इसका असली उद्देश्य ऐसी मजबूत औद्योगिक क्षमता तैयार करना है, जिससे भारत भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भर बन सके. घरेलू तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन, प्रमाणन व्यवस्था और स्थायी मांग तैयार करके ही मिशन अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरा कर पाएगा. आने वाले वर्षों में सरकार और उद्योग जगत का फोकस इसी दिशा में रहने की संभावना है.