शहतूत के पेड़ों की कटाई से उजड़ रहा कश्मीर का सिल्क कारोबार, 20 हजार करोड़ तक के नुकसान का खतरा

एक विकसित शहतूत का पेड़ हर साल लगभग 5,000 से 15,000 रुपये तक की आमदनी देता है. खास बात यह है कि यह कमाई एक-दो साल नहीं, बल्कि लगातार 30 से 50 साल तक मिलती रहती है. यानी एक बार पेड़ लगाकर किसान लंबे समय तक स्थिर आय कमा सकते हैं. यही कारण था कि कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में यह खेती बेहद लोकप्रिय रही.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 22 Apr, 2026 | 09:21 AM

Kashmir mulberry trees decline: कश्मीर की खूबसूरती सिर्फ बर्फीली वादियों और झीलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की पारंपरिक खेती और पेड़-पौधे भी इसकी पहचान रहे हैं. इन्हीं में से एक है शहतूत का पेड़, जिसने सदियों तक हजारों परिवारों की आजीविका को सहारा दिया. लेकिन अब यही शहतूत के पेड़ तेजी से गायब हो रहे हैं, और इसके साथ ही एक पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है.

शहतूत के पेड़: गांवों की जीवनरेखा

कश्मीर ऑब्जर्वर की खबर के अनुसार, कश्मीर के कई घरों के बाहर शहतूत के पेड़ आम बात थे. लोग इन पेड़ों को लगाते थे, उनकी पत्तियों से रेशम के कीड़े पालते थे और उनसे मिलने वाले कोकून बेचकर अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते थे. यह एक सरल लेकिन मजबूत आर्थिक चक्र था, पेड़ पत्तियां देता है, पत्तियां कीड़ों को खिलाई जाती हैं, कीड़े कोकून बनाते हैं और वही कोकून रेशम में बदलकर आय का स्रोत बनता है. एक तरह से देखा जाए तो यह पेड़ किसानों के लिए एक “चलता-फिरता बैंक” था, जो हर साल कमाई देता था.

हर पेड़ से सालाना कमाई

एक विकसित शहतूत का पेड़ हर साल लगभग 5,000 से 15,000 रुपये तक की आमदनी देता है. खास बात यह है कि यह कमाई एक-दो साल नहीं, बल्कि लगातार 30 से 50 साल तक मिलती रहती है. यानी एक बार पेड़ लगाकर किसान लंबे समय तक स्थिर आय कमा सकते हैं. यही कारण था कि कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में यह खेती बेहद लोकप्रिय रही.

हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी

गांदरबल, पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग और कुपवाड़ा जैसे जिलों में करीब 30,000 परिवार शहतूत और रेशम उत्पादन पर निर्भर हैं. इनकी बदौलत हर साल 150 से 300 करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलती है.

अब स्थिति बदल रही है. तेजी से हो रहे विकास कार्यों, जमीन के उपयोग में बदलाव और अनदेखी के कारण शहतूत के पेड़ काटे जा रहे हैं. हर गिरता हुआ पेड़ सिर्फ लकड़ी का नुकसान नहीं करता, बल्कि एक पूरे परिवार की आय का जरिया खत्म कर देता है. एक पेड़ का खत्म होना मतलब आने वाले कई सालों की कमाई का खत्म होना है.

भविष्य की बचत भी हो रही खत्म

अगर कोई किसान हर साल अपनी कमाई में से सिर्फ 5,000 रुपये बचाए और उसे 8% ब्याज पर निवेश करे, तो 30 साल में यह रकम 6 लाख रुपये से ज्यादा हो सकती है. अगर यही बचत 10,000 रुपये सालाना हो, तो यह रकम 12 लाख रुपये तक पहुंच सकती है.

अब सोचिए, जब 30,000 परिवार यह बचत नहीं कर पाएंगे, तो कुल मिलाकर हजारों करोड़ रुपये का नुकसान होगा. अनुमान है कि आने वाले 30 वर्षों में यह नुकसान 1,800 करोड़ से 3,600 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

रेशम उद्योग पर भी संकट

कश्मीर भारत का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां उच्च गुणवत्ता वाला बाइवोल्टाइन रेशम तैयार होता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 5,000 से 8,000 रुपये प्रति किलो तक होती है. अगर इस क्षेत्र में निवेश बढ़े और बेहतर तकनीक अपनाई जाए, तो यह उद्योग 300 करोड़ से बढ़कर 500 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकता है. लेकिन शहतूत के पेड़ खत्म होने से यह संभावना भी कमजोर होती जा रही है.

कुल नुकसान का बड़ा अंदाजा

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो अगले 30 साल में कुल नुकसान 10,000 करोड़ से 20,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है. यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि हजारों परिवारों को मजबूरी में शहरों की ओर पलायन करना पड़ सकता है.

विकास बनाम संरक्षण की बहस

आज विकास के नाम पर सड़कों और अन्य परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन एक 50 साल पुराने शहतूत के पेड़ को तैयार करने में दशकों लग जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या थोड़े से विकास के लिए इतनी बड़ी प्राकृतिक और आर्थिक संपत्ति को खत्म करना सही है?

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