रेशम की खेती से UP के किसानों की बदली किस्मत, कम लागत में कर रहे मोटी कमाई

कानपुर जिले के घाटमपुर, पतरारा और भितरगांव में अब 600 किसान एरी और मलबरी सिल्क उगा रहे हैं. प्रशिक्षण और सीधे बाजार पहुंच से रेशम पालन सफल मॉडल बन गया है। हर एकड़ से किसानों की आय 60,000-65,000 रुपये बढ़ी है. सिल्क किसानों के लिए स्थिर और लाभदायक विकल्प बन गया है.

Kisan India
नोएडा | Published: 10 Feb, 2026 | 06:00 AM

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के  कानपुर जिले में अब कई किसान अपने खेतों में रेशम की कीड़े की खेती कर रहे हैं. खासकर घाटमपुर, पतरारा और भितरगांव के गांवों में किसान बड़े स्तर पर इसकी खेती कर रहे हैं. हालांकि, पांच साल पहले तक इन गांवों में रेशम उत्पादन बिल्कुल नहीं होता था, लेकिन अब यहां एरी और मलबरी सिल्क उगाई जा रही है, जो गुजरात और पश्चिम बंगाल तक बिकती है. किसान अपनी फसलों से होने वाली अस्थिर आमदनी का विकल्प खोज रहे हैं  और रेशम पालन छोटे उत्पादन चक्र और सुनिश्चित खरीदार के कारण कारगर साबित हो रहा है. प्रशिक्षण और सीधे बाजार तक पहुंच ने इसे लोकप्रिय बनाने में मदद की है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में लगभग 600 किसान एरी और मलबरी सिल्क उत्पादन  में लगे हैं, जिससे गांव की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है. एरी सिल्क, जो अरंडी के पत्तों पर पाली जाती है, जल्दी स्वीकार की गई. अरंडी खेत की सीमा या छोटे प्लॉट में बोई जाती है और सिल्कवर्म इसके पत्तों पर पाले जाते हैं. छोटे चक्र के कारण साल में 3-4 बार पालन किया जा सकता है. किसान हर रेशम पालन चक्र में आमतौर पर 100-150 रोग-मुक्त लेयिंग (DFLs) का इस्तेमाल करते हैं और 50-60 किलो कोकून पैदा करते हैं. बीज कोकून का दाम लगभग 300 रुपये प्रति किलो है, जबकि वाणिज्यिक कोकून 100-110 रुपये प्रति किलो बिकते हैं. हर कोकून से 800-1,200 मीटर सिल्क यार्न निकलती है. गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और वाराणसी के व्यापारी सीधे गांवों से कोकून खरीदते हैं.

रेशम पालन से खेती का जोखिम कम हो गया

सुझनपुर गांव के किसान राजेश कुमार कहते हैं कि रेशम पालन से खेती का जोखिम कम हो गया है. हर चक्र में नकद आय होती है. व्यापारी गांव आते हैं, जिससे समय और परिवहन खर्च बचता है.  कोत्रा मकरंदपुर के किसान सुधीर सचान ने कहा कि सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ. हमें मिर्जापुर और असम में प्रशिक्षण मिला. तकनीक सीखने के बाद उत्पादन और गुणवत्ता  दोनों बढ़ी.

एरी सिल्क पालन अब एक मजबूत मॉडल बन गया

मलबरी सिल्क का उत्पादन भी बढ़ रहा है. बिल्हौर ब्लॉक के राजेपुर और हिलालपुर में दो सरकारी सिल्क फार्म 40-50 किसानों को मलबरी खेती और पालन में मदद कर रहे हैं. मलबरी सिल्क अपनी चमक और गुणवत्ता के कारण उच्च कीमत पर बिकता है, इसे ‘सफेद सोना’ भी कहा जाता है. उत्तर प्रदेश के सिल्क विभाग के सहायक निदेशक एसके रावत ने बताया कि घाटमपुर, पटारा और भितरगांव में एरी सिल्क पालन अब एक मजबूत मॉडल बन चुका है.

औसतन 50- 60 किलो कोकून का उत्पादन कर रहे हैं

लगभग 600 किसान हर चक्र में औसतन 50- 60 किलो कोकून का उत्पादन  कर रहे हैं. बिल्हौर के फार्म मलबरी सिल्क में तकनीकी मदद दे रहे हैं. विभाग का लक्ष्य प्रशिक्षण और नियमित निगरानी के जरिए इस मॉडल को और फैलाना है. 2024-25 में कानपुर जिले में 389.6 क्विंटल रेशम का उत्पादन हुआ. रावत के अनुसार, आय पर इसका असर बड़ा है. किसान कस्तूर बीज से प्रति एकड़ 35,000-40,000 रुपये और कोकून उत्पादन से अतिरिक्त 20,000-25,000 रुपये कमाते हैं. यानी सिल्क पालन से प्रति एकड़ सालाना 60,000-65,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है.

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Published: 10 Feb, 2026 | 06:00 AM

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