Sugarcane Farmers: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित कई राज्यों में किसान बड़े स्तर पर गन्ने की खेती करते हैं. इससे किसानों को अच्छी कमाई होती है. लेकिन किसानों का कहना है कि बुवाई के बाद गन्ने की पैदावार अच्छी नहीं होती है. इससे कई बार उनको नुकसान भी उठाना पड़ता है. लेकिन ऐसे किसानों को अब चिंता करने की जरूरत नहीं है. क्योंकि आज हम गन्ने की बुवाई और खाद के इस्तेमाल को लेकर ऐसी जानकारी देने जा रहे हैं, जिसे अपनाते ही गन्ने की पैदावार बढ़ जाएगी.
दरअसल, गन्ना की अच्छी पैदावार और मुनाफा सीधे बीज के सही चयन और मात्रा पर निर्भर करता है. एक आंख वाला गन्ना बोने पर करीब 10 क्विंटल प्रति एकड़ और दो आंख वाला गन्ना बोने पर लगभग 20 क्विंटल बीज की जरूरत होती है. सही मात्रा में बीज बोने से अंकुरण, पौधों की संख्या और उत्पादन बढ़ता है, जबकि गलत मात्रा से पैदावार घट सकती है. इसलिए किसानों को बीज की मात्रा और प्रकार पर ध्यान रखना चाहिए और खेत की तैयारी उसी अनुसार करनी चाहिए.
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के अलावा अब कई राज्यों में गन्ना धीरे-धीरे किसानों की पसंदीदा नकदी फसल बनता जा रहा है. क्योंकि कई किसान गन्ना की खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं और फिलहाल बसंतकालीन और शरदकालीन फसल के लिए खेत तैयार कर रहे हैं. ऐसे गन्ना बोते समय सही बीज का चयन बहुत जरूरी है. अगर रोगग्रस्त या खराब बीज लगाया जाए तो अंकुरण कमजोर होता है, पौधों की संख्या कम हो जाती है और उत्पादन घट जाता है.
इस तरह के बीज का करें चयन
कृषि एक्सपर्ट के अनुसार, 9-10 महीने पुराना स्वस्थ गन्ना बीज के लिए सबसे अच्छा होता है, जबकि 11-12 महीने पुराना गन्ना अंकुरण कम कर देता है. लाल निशान, सड़न या रोग वाले गन्ने को बीज के रूप में बिल्कुल न लें. ऐसे गन्ने से बने उत्पाद की मार्केट में मांग हमेशा रहती है. इसकी मांग गुड़, चीनी और बायो-ईंधन उद्योग में हमेशा रहती है. शुगर मिल होने के कारण किसानों को गन्ना आसानी से बेचने में मदद मिलती है. इसी वजह से गन्ना गेहूं और चना जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक मुनाफा देता है.
लाल सड़न रोग से बचाने के उपाय
बता दें कि गन्ने के खेत में लाल सड़न रोग भी लगता है. इसलिए प्रभावित खेतों में रोटावेटर का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमित गन्ने के अवशेष पूरे खेत में फैल जाते हैं और बीमारी तेजी से फैलती है. एक्सपर्ट ने जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा हरजेनियम के प्रयोग की सलाह दी. इसके लिए 2 किग्रा ट्राइकोडर्मा, 2 किग्रा गुड़, 1 किग्रा बेसन और 200 लीटर पानी मिलाकर घोल तैयार करें और 7 दिन तक छांव में सड़ने दें. तैयार घोल को सिंचाई के पानी के साथ नाके पर रखकर खेत में प्रवाहित करें. इस जैविक फफूंदनाशक का दो बार प्रयोग करना जरूरी है, जिससे खेत में लाल सड़न रोग के बीजाणु नियंत्रण में रहते हैं और गन्ने की गिरी पत्तियां भी तेजी से सड़ जाती हैं.