मदुरै से कन्नौज तक फूल खिलने से पहले सड़ रही हैं कलियां, चमेली की खेती पर मंडराया नया खतरा

इस कीट की सबसे खतरनाक विशेषता इसका तेज जीवन चक्र है. महज 16 से 21 दिनों में इसका पूरा जीवन चक्र पूरा हो जाता है. इसका मतलब है कि अनुकूल मौसम मिलने पर एक ही सीजन में इसकी कई पीढ़ियां तैयार हो सकती हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 5 Jan, 2026 | 02:30 PM

Jasmine cultivation: भारत में चमेली की खुशबू सिर्फ इत्र या पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लाखों किसानों की रोजी-रोटी से जुड़ी हुई है. दक्षिण भारत के मदुरै से लेकर उत्तर प्रदेश के कन्नौज तक फैली चमेली की खेती अब एक नए और गंभीर कीट संकट का सामना कर रही है. वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक ऐसे सूक्ष्म कीट की पहचान की है, जो दिखने में भले ही मामूली हो, लेकिन इसके कारण फूलों की पैदावार और गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ रहा है. यह संकट ऐसे समय सामने आया है, जब फूलों की खेती जलवायु बदलाव और बढ़ती लागत से पहले ही दबाव में है.

चमेली पर मंडराता अदृश्य खतरा

चमेली भारत की सबसे महत्वपूर्ण पुष्प फसलों में गिनी जाती है. इसका उपयोग इत्र उद्योग, अगरबत्ती निर्माण, सौंदर्य प्रसाधनों और धार्मिक आयोजनों में बड़े पैमाने पर होता है. खासतौर पर अरबी चमेली, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Jasminum sambac कहा जाता है, देश के कई हिस्सों में नकदी फसल के रूप में उगाई जाती है. लेकिन अब इसी फसल पर एक नई ब्लॉसम मिज प्रजाति का हमला सामने आया है, जो सीधे फूल की कली को नष्ट कर देती है.

वैज्ञानिक खोज ने खोली नई चुनौती की तस्वीर

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुणे स्थित ICAR-फ्लोरीकल्चर निदेशालय के वैज्ञानिकों ने इस नई ब्लॉसम मिज की पहचान की है, जिसे कॉन्टारिनिया इकार्डिफ्लोरेस नाम दिया गया है. यह नाम संस्थान के सम्मान में रखा गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कीट पहले से पहचानी गई ब्लॉसम मिज प्रजाति से अलग है और आनुवंशिक रूप से भी इसकी पहचान स्पष्ट रूप से अलग साबित हुई है. यह खोज बताती है कि फूलों की खेती में भी कीटों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है.

कैसे करता है यह कीट नुकसान

यह ब्लॉसम मिज बेहद सूक्ष्म होती है और इसकी लंबाई महज कुछ मिलीमीटर होती है. इसके लार्वा सीधे चमेली की कली के अंदर पनपते हैं. जैसे ही कली विकसित होने लगती है, यह कीट उसके भीतर से नुकसान पहुंचाता है. नतीजा यह होता है कि कली असामान्य रूप से फूल जाती है, उसका रंग बदल जाता है और वह खिलने से पहले ही सड़कर गिर जाती है. किसान जब खेत में फूल तोड़ने पहुंचता है, तो उसे तैयार फूलों की जगह खराब कलियां मिलती हैं.

तेज जीवन चक्र, बड़ा जोखिम

इस कीट की सबसे खतरनाक विशेषता इसका तेज जीवन चक्र है. महज 16 से 21 दिनों में इसका पूरा जीवन चक्र पूरा हो जाता है. इसका मतलब है कि अनुकूल मौसम मिलने पर एक ही सीजन में इसकी कई पीढ़ियां तैयार हो सकती हैं. यही वजह है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कुछ ही महीनों में पूरे क्षेत्र में फैल सकता है.

मदुरै से कन्नौज तक असर

तमिलनाडु का मदुरै इलाका अपनी ‘मदुरै मल्ली’ के लिए देशभर में मशहूर है, जिसे जीआई टैग भी मिला हुआ है. वहीं उत्तर प्रदेश का कन्नौज इत्र उद्योग का केंद्र माना जाता है, जहां चमेली की मांग लगातार बनी रहती है. इस नए कीट का असर इन दोनों ही क्षेत्रों में दिखने लगा है. इसके अलावा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी किसान सतर्क हो गए हैं.

किसानों और उद्योग के लिए चिंता

चमेली की खेती से बड़ी संख्या में छोटे किसान और ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हुई हैं. फूलों की तोड़ाई, माला निर्माण और स्थानीय बाजारों में बिक्री से उनकी रोज की आय चलती है. अगर फूलों की पैदावार घटती है, तो इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा. साथ ही इत्र और अगरबत्ती उद्योग को भी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ सकता है.

इस खोज का बड़ा महत्व

इस नई ब्लॉसम मिज की पहचान केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भविष्य की रणनीति तय करने की कुंजी भी है. अब सटीक पहचान के जरिए लक्षित कीट प्रबंधन संभव हो सकेगा. इससे अनावश्यक कीटनाशक छिड़काव कम होगा और पर्यावरण के अनुकूल उपायों को बढ़ावा मिलेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह खोज इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

आगे क्या जरूरी है

फूलों की खेती को अब सिर्फ सजावटी कृषि के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखने की जरूरत है. उभरते कीटों की नियमित निगरानी, किसानों को समय पर चेतावनी और प्रशिक्षण, और जैविक नियंत्रण उपायों पर शोध ही इस संकट से निपटने का रास्ता दिखा सकते हैं. अगर समय रहते सही कदम उठाए गए, तो चमेली की खुशबू को इस नए खतरे से बचाया जा सकता है.

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