परमाणु विस्फोट से घट जाएगी पैदावार, मछली और मवेशियों पर भी पड़ेगा असर.. गहरा जाएगा खाद्य संकट

परमाणु विस्फोट पृथ्वी पर होने वाली सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक है. इससे बड़े पैमाने पर जनहानि, बुनियादी ढांचे का विनाश और पर्यावरण को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता है. विशेषज्ञों के अनुसार, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र- जैसे पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, मिट्टी और जल संसाधन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.

डॉ. अनिल कुमार
नोएडा | Updated On: 8 Mar, 2026 | 10:32 AM

Nuclear Explosions And Agriculture: वैश्विक स्तर पर युद्ध की परिस्थितियों ने अनिश्चितता उत्पन्न कर दी है. वर्तमान समय में यूक्रेन-रूस युद्ध के साथ-साथ सूडान में भी सैन्य संघर्ष शुरू हो चुका है. मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान, इजराइल, अमेरिका, फिलिस्तीन और लेबनान जैसे देशों के बीच भी तनाव की स्थिति बनी हुई है. इसके अलावा अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित लगभग 10 देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघर्ष की स्थिति में हैं. यानी ईरान और खाड़ी देशों के अलावा कुल मिलाकर लगभग 15 देशों पर युद्ध का प्रभाव दिखाई दे रहा है. ऐसे में झांसी स्थित रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और निदेशक (शिक्षा) डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि इन परिस्थितियों में तृतीय विश्व युद्ध एवं परमाणु विस्फोट की संभावना भी प्रबल होती जा रही है. उन्होंने किसान इंडिया से कहा कि इसका दुष्परिणाम केवल मानवता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेड़-पौधों, खड़ी फसलों, खेत-खलिहानों, पशुपालन, सामान्य जीव-जंतुओं और जैव विविधता के साथ-साथ पर्यावरण तथा सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा.

प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि परमाणु विस्फोट पृथ्वी पर होने वाली सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक है. इससे बड़े पैमाने पर जनहानि, बुनियादी ढांचे का विनाश और पर्यावरण को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता है. विशेषज्ञों के अनुसार, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र- जैसे पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, मिट्टी और जल संसाधन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका खतरे में पड़ सकती है. उनके मुताबिक, विकिरण का प्रभाव कृषि के लिए एक बड़ा खतरा है. आयनकारी विकिरण की उच्च मात्रा पौधों की वृद्धि को रोक सकती है, बीजों को नुकसान पहुंचा सकती है और फसलों की उत्पादकता को बहुत कम कर सकती है. कुछ मामलों में विकिरण पौधों में आनुवंशिक परिवर्तन (म्यूटेशन) भी उत्पन्न कर सकता है, जिससे भविष्य की फसल पीढ़ियां प्रभावित हो सकती हैं.

रेडियोधर्मी कण मिट्टी और जल स्रोतों पर जम जाते हैं

सबसे खतरनाक दीर्घकालिक प्रभावों में से एक रेडियोधर्मी फॉलआउट है. इसमें रेडियोधर्मी कण मिट्टी, फसलों और जल स्रोतों पर जम जाते हैं और दशकों तक कृषि भूमि को प्रदूषित कर सकते हैं. ऐसी मिट्टी में उगाई गई फसलें सीजियम और स्ट्रॉन्शियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों को अवशोषित कर सकती हैं, जिससे वे मनुष्यों और पशुओं के उपभोग के लिए असुरक्षित हो जाती हैं और किसानों को उस भूमि को छोड़ना पड़ सकता है. वहीं, पशुपालन क्षेत्र  को भी भारी नुकसान हो सकता है.

परमाणु विस्फोट मिलकर ‘न्यूक्लियर विंटर’ की स्थिति पैदा कर सकते हैं

वैज्ञानिक यह भी चेतावनी देते हैं कि कई परमाणु विस्फोट मिलकर ‘न्यूक्लियर विंटर’ की स्थिति पैदा कर सकते हैं. इसमें धुआं और धूल सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध कर देते हैं, वैश्विक तापमान कम हो जाता है और वर्षा का चक्र प्रभावित होता है. ऐसी परिस्थितियों में प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है, फसल उत्पादन में भारी गिरावट आती है और वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट तथा अकाल की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.साथ ही पर्यावरणीय क्षति से आगे बढ़कर इसके आर्थिक और सामाजिक परिणाम भी अत्यंत गंभीर हो सकते हैं. खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाएं ध्वस्त हो सकती हैं,क्योंकि परिवहन, भंडारण और बाजार नष्ट हो सकते हैं या दूषित हो सकते हैं. ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार घट जाएगा, खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और खाद्य असुरक्षा में तीव्र वृद्धि हो सकती है.

परमाणु विस्फोट से कृषि और इससे जुड़े सेक्टर पर होगा प्रभाव

कृषि पर तात्कालिक प्रभाव: परमाणु विस्फोट कृषि पर गंभीर और विनाशकारी प्रभाव डालता है. इससे फसलें, कृषि भूमि, जल संसाधन, पशुधन और पूरा कृषि तंत्र नष्ट हो सकता है.

फसलों और कृषि भूमि का विनाश: परमाणु विस्फोट से उत्पन्न तीव्र धमाका, अत्यधिक गर्मी और अग्नि-तूफान तुरंत खड़ी फसलों, बाग-बगीचों, खेतों की इमारतों, सिंचाई प्रणालियों और कृषि मशीनों को नष्ट कर देते हैं. बड़े-बड़े कृषि क्षेत्र जल सकते हैं या पूरी तरह समतल हो सकते हैं, जिससे वे खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाते हैं.

रेडियोधर्मी फॉलआउट और मिट्टी का प्रदूषण: विस्फोट के बाद रेडियोधर्मी कण फॉलआउट के रूप में जमीन पर गिरते हैं और मिट्टी को सीजियम, स्ट्रोंशियम और आयोडीन जैसे तत्वों से प्रदूषित कर देते हैं. ऐसी मिट्टी में उगाई गई फसलें इन पदार्थों को अपने अंदर अवशोषित कर लेती हैं, जिससे वे खाने के लिए असुरक्षित हो जाती हैं.

मिट्टी की उर्वरता में कमी: विकिरण मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देता है और पोषक तत्वों के चक्र को बाधित करता है. इससे मिट्टी की उर्वरता  घट जाती है और कई वर्षों तक फसलों की उत्पादकता कम हो जाती है.

जल संसाधनों का प्रदूषण: नदियां, झीलें, भूजल और सिंचाई प्रणालियां भी रेडियोधर्मी हो सकती हैं. यदि ऐसे प्रदूषित पानी का उपयोग सिंचाई में किया जाए तो विकिरण खेतों और फसलों में और अधिक फैल सकता है.

पशुधन और डेयरी पर प्रभाव: दूषित घास खाने या प्रदूषित पानी पीने से पशुओं में विकिरण-जनित बीमारियां हो सकती हैं, उनकी प्रजनन क्षमता घट सकती है या उनकी मृत्यु भी हो सकती है. रेडियोधर्मी पदार्थ दूध, मांस और अंडों में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे वे मानव उपभोग के लिए असुरक्षित हो जाते हैं. गंभीर परिस्थितियों में खाद्य श्रृंखला में प्रदूषित भोजन को जाने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पशुओं को नष्ट करना पड़ सकता है.

दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव: यदि कई परमाणु विस्फोट हों तो ‘न्यूक्लियर विंटर’ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. वातावरण में धुआं और धूल सूर्य के प्रकाश को रोक देते हैं, जिससे वैश्विक तापमान कम हो जाता है और फसलों के बढ़ने का मौसम छोटा हो जाता है. कम सूर्यप्रकाश के कारण प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया सीमित हो जाती है, जिससे फसल उत्पादन में भारी गिरावट आती है और वैश्विक खाद्य संकट का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे विकिरण पौधों और जानवरों के डीएनए को भी नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे आनुवंशिक परिवर्तन (म्यूटेशन) होते हैं. इससे फसलों की असामान्य वृद्धि, कम प्रजनन क्षमता और कई पीढ़ियों तक कम उत्पादकता देखी जा सकती है.

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: परमाणु आपदा के कारण परिवहन, भंडारण और बाजार व्यवस्था नष्ट या प्रदूषित हो सकती है, जिससे खाद्य आपूर्ति श्रृंखला टूट जाती है. खेती बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार घट जाता है और कई समुदाय गरीबी की ओर धकेल दिए जाते हैं. वहीं, खाद्य उत्पादन में कमी और आपूर्ति में बाधा के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, जिससे अकाल और कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है. अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में कृषि भूमि कई वर्षों तक परित्यक्त रह सकती है, जिससे कृषि समुदायों को लंबे समय तक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.

नोटः (प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार झांसी स्थित रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में निदेशक (शिक्षा) हैं. उन्होंने कृषि सेक्टर में ग्रोथ लाने के लिए कई उल्लेखनीय शोध किए हैं. वहीं, इस लेख में शोधार्थी अंजली सिंह ने भी सहयोग किया है.)

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Published: 7 Mar, 2026 | 09:43 PM

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