100 रुपये में 50 किलो आलू.. लागत निकालना तो दूर कर्ज में डूब रहे किसान, सरकारी दावों की खुली पोल

Potato Farmers: पश्चिम बंगाल के सिंगूर में आलू की अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों को सही दाम नहीं मिल रहा है. गिरती कीमत, कोल्ड स्टोरेज की कमी और कमजोर मार्केटिंग के कारण किसान मजबूरी में फसल सस्ते में बेच रहे हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री के सामने किसानों ने अच्छी कीमत मिलने के सरकारी दावों की पोल खोल दी.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 9 Apr, 2026 | 07:07 PM

Potato Farmers: पश्चिम बंगाल के सिंगूर में आलू किसानों की परेशानी एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बन गई है. केंद्र और राज्य सरकारें किसानों के सही दाम देने का दावा करती हैं, लेकिन हकीकत में किसानों को अपनी उपज की लागत निकालना तो दूर कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो गया है. सिंगूर पहुंचे केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) ने किसानों से बातचीत की. इस दौरान किसानों ने बताया कि उनकी आलू 2 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकी है. जबकि, लागत इससे कहीं ज्यादा है. कृषि मंत्री ने आलू की गिरती कीमत और फसल का सही दाम न मिलने को गंभीर बताया. उन्होंने कहा कि किसान दिन-रात मेहनत कर फसल तैयार करता है, लेकिन जब बाजार में उसे लागत के बराबर भी दाम नहीं मिलता, तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि किसान की मेहनत का अपमान है.

मेहनत से उगी फसल, लेकिन दाम ने तोड़ी किसानों की कमर

सिंगूर के किसानों ने इस साल आलू की अच्छी पैदावार ली, लेकिन बाजार में कीमतें  इतनी नीचे चली गईं कि उनकी सारी मेहनत पर पानी फिरता दिख रहा है. किसानों का कहना है कि कई जगह 50 किलो आलू सिर्फ 100 रुपये तक बिक रहा है, जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि किसान बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और भंडारण पर खर्च करता है. जब बाजार में उसे सही दाम नहीं मिलता, तो उसका पूरा आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है. यही वजह है कि कई किसान अगली फसल को लेकर भी चिंता में हैं.

योजनाएं हैं, लेकिन फायदा नहीं पहुंचा किसानों तक

केंद्रीय कृषि मंत्री  ने कहा कि किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार के पास PSS, मार्केट इंटरवेंशन स्कीम और भावांतर भुगतान जैसी योजनाएं उपलब्ध हैं. इन योजनाओं का मकसद यही है कि जब बाजार में कीमतें गिरें, तब किसानों को सहारा मिले. उन्होंने कहा कि अगर राज्य सरकार समय पर प्रस्ताव भेजे, तो किसानों की उपज की खरीद और भंडारण के लिए तुरंत मदद मिल सकती है. लेकिन किसानों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का फायदा उन तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया. इसी वजह से आलू किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम में बेचनी पड़ रही है. ऐसे राहत की योजनाएं कागज पर हैं, लेकिन किसान चाहता है कि उसका फायदा सीधे खेत तक पहुंचे.

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गिरते दाम और स्टोरेज कमी से किसान परेशान लगातार.

कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग की कमी से बढ़ी मुश्किल

आलू जैसी फसल में सबसे बड़ी जरूरत  होती है कोल्ड स्टोरेज और सही बाजार. अगर किसान के पास भंडारण की सुविधा हो, तो वह कम दाम पर मजबूरी में फसल बेचने से बच सकता है. सिंगूर के किसानों ने बताया कि कई बार जगह की कमी, ज्यादा किराया या समय पर स्टोरेज न मिलने से उन्हें तुरंत आलू बेचने पड़ते हैं. यही वजह है कि बाजार में सप्लाई बढ़ते ही कीमतें टूट जाती हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और बेहतर मार्केटिंग नेटवर्क मजबूत हो जाए, तो किसान अपनी उपज का सही दाम पा सकता है. इससे वैल्यू एडिशन के जरिए चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स में भी फायदा बढ़ेगा.

किसानों को पूरा दाम दिलाने का संकल्प

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि किसानों को उनकी मेहनत का पूरा दाम दिलाना  सरकार की प्राथमिकता है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर कृषि मार्केटिंग, स्टोरेज और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल हो, तो आलू किसानों की स्थिति तेजी से सुधर सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि सिंगूर जैसे इलाके को एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब के रूप में विकसित किया जा सकता है, जहां कोल्ड स्टोरेज, नई तकनीक और वैल्यू एडिशन की सुविधाएं हों. इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के ज्यादा विकल्प मिलेंगे और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बनेंगे.

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Published: 9 Apr, 2026 | 06:22 PM
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